Friday, January 28, 2022

गरीब नवाज यूनिवर्सिटी से जामियत उलेमा-ए-हिन्द का कोई वास्ता नही: दरगाह दीवान

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अजमेर 7 सितम्बर। सूफी संत हजरत ख्वाजा मोईनुद्दीन चिष्ती के वंषज एवं वंषानुगत सज्जादानषीन दरगाह के आध्यात्मीक प्रमुख दीवान सैयद जैनुल आबेदीन अली खान ने स्पष्ट किया की जमियत उलेमाऐ हिन्द से उनका जुड़ाव समाज के शैक्षणिक उत्थान और आतंवाद का विरोध करने के लिये देश भर के सज्जादान मुस्लिम धर्म गुरूओं को एक जाजम लाने का जमियत के प्रयास के लिये था ना कि किसी राजनैतिक दल के विरोध के लिये। उन्होने कहा कि जमियत उलेमाऐ हिन्द के किसी राजनैतिक ब्यान पर उनका कोई सर्मथन नही था ना है।

दरगाह दीवान ने बुधवार को एक संवावादाता सम्मेलन में यह साफ कर दिया की गरीब नवाज युनिर्वसिटी की स्थापना के संर्दभ में जमियत उलेमाऐ हिन्द के हवाले से जो खबरे छपी है उसके लिये दरगाह दीवान या उनके किसी प्रतिनिधी की जमियत के नेताओं से काइे आधिकारिक बातचीत नहीं हुई है और ना ही किसी प्रकार की भूमि देने का काई करार हुआ है। उन्होने कहा कि उनकी खुद यह इच्छा है कि गरीब नवाज के नाम से एक विश्वविद्यालय की स्थापना हो जिससे सूफी शिक्षा का प्रचार प्रसार किया जाऐ लैकिन ऐसा कोई भी विश्वविद्यालय उनके अपने खर्च एवं स्वसम्पत्ति पर उनके द्वारा संचालित ख्वाजा मोईनुद्दीन एज्युकेष्नल ट्रस्ट के अधीन स्थापित किया जाऐगा।

उन्होने आगे कहा की विष्वविद्यालय की स्थापना मेरे जीवनकाल में पूरी हो जाती है तो सही वर्ना मैं अपने जानशीन (उत्तराधिकारी) को सह वसियत करूंगा की इस विश्वविद्यालय की स्थापना करे क्योंकि यह ना सिर्फ उनकी बल्की उनके पिता दीवान इल्मुद्दीन साहब की खवाहिष थी। दरगाह दीवान ने जमियत के राजस्थान महासचिव अब्दुल वहिद खत्री के मंगलवार को छपे बयान पर कहा कि ऐसे राजनैतिक बयान से उनके कोई वासता नहीं है वह खुद किसी राजनैतिक दल के विरोधी नही हैं क्योंकि वह धर्मगुरू है और राजनैतिक रूप से कभी विचार व्यक्त नहीं करते है इसलिये यह जमियत के नेताओं के अपने निजि विचार है।

उन्होने स्पष्ट किया की जहा तक जमियत के 33वे अधिवेषन की सदारत पर सहमति का प्रश्न है जमियत के उलेमाओं इस लिये दी गई थी की अधिवेशन में देश भर के उलेमाओं धर्मगुरूओ और सज्जादगान को एक जाजम पर लाकर आतंकवाद के विरोध के साथ मुसलमानो की बुनियादी जरूरतों और समस्याओं को सरकार के समक्ष प्रमुखता रखने का प्रस्ताव उनके समक्ष जमियत के आला नेतादो ने रखा था। यदि अधिवेशन में सरकार के खिलाफ कोई प्रस्ताव या बात की जाती है तो वह ऐ किसी भी आयोजन में जाने से अपने आप को अलग रखेगे।

उन्होने आगे कहा कि एक धर्मगुरू की हैसियत उनका यह मानना है की कोई भी सरकार जब जनमत से चुनकर आई है तो वह देश व राज्य का हित साधने के लिये कार्य करती है चाहे वह किसी भी राजनैतिक दल की हो। उसका विरोध करके धार्मिक इच्छाओं की पूर्ती कतई जायज नहीं हैं।

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