Tuesday, October 26, 2021

 

 

 

‘कुरान आधारित है मुस्लिम पर्सनल लॉ, बदला नहीं जा सकता’ – जमीयत उलेमा-ए-हिंद

- Advertisement -
- Advertisement -

सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिलाओं के प्रति लिंगभेद समेत विभिन्न मसलों को लेकर दाखिल जनहित याचिका में शुक्रवार को मुस्लिम संगठन जमीयत-उलेमा-ए-हिंद को पक्षकार बनने की अनुमति दे दी। प्रधान न्यायाधीश तीरथ सिंह ठाकुर, न्यायमूर्ति ए के सीकरी और न्यायमूर्ति आर भानुमति की 3 सदस्यीय पीठ ने केंद्र और इस संगठन को 6 हफ्तों में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।

मूल अधिकारों में दखल नहीं?

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के अटॉर्नी जनरल और नैशनल लीगल सर्विस अथॉरिटी को जवाब दाखिल करने को कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने पूछा था कि क्या जो मुस्लिम महिलाएं भेदभाव की शिकार हो रही हैं, उसे उनके मूल अधिकार का उल्लंघन नहीं मानना चाहिए और क्या यह अनुच्छेद-14 (समानता) और 21 (जीवन के अधिकार) में दखल नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे भी कई मामले सामने आए हैं, जिनमें कहा गया है लड़की को पैतृक संपत्ति में हिंदू उत्तराधिकार कानून के तहत समान अधिकार मिलने चाहिए। कई मामलों में मुस्लिम महिलाओं को पति से मिलने वाले मनमाने तलाक और दूसरी शादी करने जैसे मामले में पहली पत्नी के लिए सेफगार्ड नहीं है।

चुनौती नहीं दी जा सकती
जमीयत उलेमा-ए-हिन्द की याचिका के अनुसार सुप्रीम कोर्ट मुस्लिम पर्सनल लॉ में प्रचलित शादी, तलाक और गुजारा भत्ते के चलन की संवैधानिक वैधता की परख नहीं कर सकता है क्योंकि पर्सनल कानूनों को मौलिक अधिकारों के सहारे चुनौती नहीं दी सकती।

धर्मग्रंथ से पर्सनल लॉ
जमीयत उलेमा-ए-हिंद का कहना है कि पर्सनल लॉ को इस आधार पर वैधता नहीं मिली है कि इन्हें किसी कानून या सक्षम अधिकारी ने बनाया है। पर्सनल लॉ का मूलभूत स्रोत उनके अपने धर्मग्रंथ हैं। मुस्लिम कानून मूलरूप से पवित्र कुरान पर आधारित है और इसलिए यह संविधान के अनुच्छेद 13 में उल्लिखित ‘लागू कानून’ की अभिव्यक्ति के दायरे में नहीं आ सकता। इसकी वैधता को संविधान के भाग-3 के आधार पर दी गयी चुनौती पर नहीं परखा जा सकता।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Hot Topics

Related Articles