Sunday, August 1, 2021

 

 

 

अपने तबादले पर बोले जस्टिस एस. मुरलीधर – 17 फरवरी को ही मिल गई थी सूचना

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नई दिल्ली. राष्ट्रीय राजधानी में पिछले हफ्ते हुई हिं*सा के दौरान भाजपा नेताओं के भड़काऊ बयानों पर कार्रवाई न करने पर पुलिस को फटकार लगाने वाले हाईकोर्ट के जस्टिस एस मुरलीधर ने अपने तबादले से संबंधित विवाद पर स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा, 17 फरवरी को चीफ जस्टिस एसए बोबड़े से पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में उनके स्थानांतरण के लिए कॉलेजियम की सिफारिश की सूचना मिली थी। उन्होंने इसे स्वीकार कर बता दिया था कि कोई समस्या नहीं है।

दरअसल, केंद्र सरकार द्वारा 26 फरवरी की रात को न्यायमूर्ति मुरलीधर के तबादले की अधिसूचना के बाद विवाद पैदा हो गया था। उसी दिन उनकी अध्यक्षता वाली पीठ ने कथित तौर पर नफरत भरे भाषण देने के लिए भाजपा के तीन नेताओं के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने में विफल रहने के लिए दिल्ली पुलिस की खिंचाई की थी। गुरुवार को दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने समारोह पूर्वक उन्हें विदाई दी।

विदाई समारोह में जस्टिस मुरलीधर ने कहा- जब न्याय को जीतना होता है, तो वह जीतता ही है। अपने तबादले के बाद संपर्क में रहने के लिए जस्टिस मुरलीधर ने दिल्ली हाईकोर्ट के जजों और वकीलों की तारीफ की। उन्होंने कहा कि अपने तबादले पर उन्हें कोई परेशानी नहीं है।

जस्टिस मुरलीधर ने कहा, “मुझे 17 फरवरी को कॉलेजियम का पत्र मिला। इसमें तबादले का प्रोपोजल था और उस पर मेरी राय मांगी गई थी। मैंने कहा कि अगर मेरा तबादला किया जाना है, तो पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ठीक रहेगा।” पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में पदभार ग्रहण करने से पहले दिल्ली में आयोजित विदाई समारोह में जस्टिस मुरलीधर ने कहा- जब न्याय को जीतना होता है, तो वो जरूर जीतता है… सच के साथ रहिए, न्याय जरूर मिलेगा।

26 फरवरी को सरकार ने नोटिफिकेशन जारी किया

केंद्रीय कानून और न्याय मंत्रालय से 26 फरवरी को जारी हुई अधिसूचना में कहा गया- संविधान के अनुच्छेद 222 की धारा (1) में दी गई शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से चर्चा के बाद, राष्ट्रपति दिल्ली हाईकोर्ट के जज जस्टिस एस मुरलीधर को पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट का जज बनाए जाने की सूचना जारी करते हैं। उन्हें पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट पहुंचकर पदभार ग्रहण करने का निर्देश दिया जाता है। जस्टिस मुरलीधर के लिए जारी तबादले की इसी अधिसूचना पर राजनीतिक विवाद हुआ था।

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