नागरिकता संशोधन विधेयक (सीएबी) के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में पहली याचिका दाखिल हो गई है। इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) के चार सांसदों ने ये याचिका दायर की है। जिसमे कहा गया कि ये बिल संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है, इसलिए इस विधेयक को रद्द किया जाए।

सुप्रीम कोर्ट में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने याचिका में सुप्रीम कोर्ट से नागरिकता संशोधन विधेयक 2019 को गैरकानूनी और शून्य घोषित करने का अनुरोध किया।

IUML ने अपनी याचिका में कहा, ‘ नागरिकता संशोधन बिल संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत ट्वीन टेस्ट पर खरा नहीं उतरता है। धर्म के आधार पर वर्गीकरण को संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। यह विधेयक संविधान में वर्णित सेक्युलरिज्म के मूल सिद्धांतों का हनन करता है।’ मुस्लिम लीग के चार सांसदों की ओर से याचिका दाखिल हुई है।

इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के राष्ट्रीय महासचिव पीके कुन्हालीकुट्टी ने नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2019 को असंवैधानिक करार दिया। उन्होंने जानकारी दी थी कि उनकी पार्टी आज सुप्रीम में संसद द्वारा पारित विधेयक के खिलाफ याचिका दायर करेगी।

कुन्हालीकुट्टी ने बताया, “यह बिल असंवैधानिक है। यही कारण है कि हमारी पार्टी आज एक याचिका दायर कर रही है। बिल पूरी तरह से संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है, जो हर किसी के लिए समानता कहता है और यह बिल लोगों के साथ धर्म के आधार पर भेदभाव करता है। कोई भी संसद में संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ कुछ भी निर्णय नहीं ले सकता है।” उन्होंने कहा, “हमने सुना है कि कांग्रेस याचिका (कैब के खिलाफ) दायर करेगी। उन्हें इस पर फैसला करना होगा।”

 

क्या हैं आर्टिकल 14, आर्टिकल 15 और आर्टिकल 21?

आर्टिकल 14: समानता का अधिकार: संविधान के आर्टिकल 14 के अनुसार, राज्य किसी भी नागरिक के साथ धर्म, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करेगा और हर नागरिक को समानता का अधिकार मिलेगा।

आर्टिकल 15 में भी समानता के अधिकारों का ही वर्णन है, बस इसमें राज्य के साथ ही व्यक्तिगत भेदभाव को भी शामिल किया गया है। यानी यह प्रावधान राज्य और निजी दोनों व्यक्तियों द्वारा भेदभाव को रोकता है जबकि आर्टिकल 14 का प्रावधान केवल राज्य द्वारा भेदभाव को प्रतिबंधित करता है।

आर्टिकल 15 के मुताबिक, ‘कोई भी नागरिक किसी भी धर्म, जाति, नस्ल, लिंग, जन्म स्थान के आधार पर किसी भी अपात्रता, दायित्व, प्रतिबंध या शर्त के अधीन नहीं होगा।’

आर्टिकल 21: जीने और आजादी का अधिकार: संविधान के आर्टिकल 19 से 22 तक जीने, आजादी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकारों का जिक्र है।

आर्टिकल-21: संविधान का ये आर्टिकल किसी भी नागरिक के दो महत्वपूर्ण अधिकारों से जुड़ा है, पहला-जीने का अधिकार और दूसरा अपनी आजादी का अधिकार: आर्टिकल 21 के मुताबिक, ‘कानून द्वारा तय प्रक्रिया को छोड़कर किसी भी व्यक्ति को जीने के अधिकार या आजादी के अधिकार से वंचित नहीं रखा जाएगा।’

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