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मुज़फ़्फ़रनगर । धर्मनिरपेक्ष कहलाने वाले इस देश की मौजूदा स्थिति बेचैन कर देने वाली है। फ़िलहाल राष्ट्रवाद के नाम पर अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेकी जा रही है। इसके लिए कुछ राजनीतिक दल और संगठन कुछ भी करने के लिए तैयार है। 2014 में , देश में एक प्रयोग किया गया जो सफल रहा। अब इसी प्रयोग को दोबारा दोहराने की कोशिश हो रही है। देश को फिर हिंदू-मुस्लिम में बाँटने का प्रयास किया जा रहा है।

चूँकि देश में हर साल कही न कही चुनाव होते है इसलिए इस प्रयोग को हर जगह आज़माया जा रहा है। 2019 में बड़ा चुनाव है, देश को फिर अपना प्रधानमंत्री चुनना है इसलिए तैयारियाँ हो चुकी है। लेकिन अब लोग समझदार हो चुके है। वो ख़ुद को हिंदू मुस्लिम की इस राजनीति से अलग रखना चाहते है।  इसकी एक बानगी हमें गुजरात में देखने को मिली और अब राजस्थान के उपचुनाव में।

उत्तर प्रदेश के कासगंज में जो हुआ वह बेहद निंदनीय है। एबीवीपी और विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता, तिरंगा यात्रा लेकर एक ऐसे चौक से गुज़रे जहाँ पहले से तिरंगा फहराने की तैयारियाँ चल रही थी। लेकिन फिर भी झगड़ा हुआ। इसमें एक युवक की मौत हो गयी। अब इस मामले को कुछ ऐसा रंग देने की कोशिश हो रही है की हम अपने ही देश में अगर तिरंगा फहराएँगे तो गोली खाएँगे। साफ़ है की इस घटना को साम्प्रदायिक रंग देकर सियासी लाभ लेने का प्रयास हो रहा है।

यही वजह है की कुछ संगठन इस मुद्दे को शांत होने देना नही चाहते। इसलिए विश्व हिंदू परिषद और हिंदू महासभा उत्तर प्रदेश के हर जिले में तिरंगा यात्रा का आयोजन कर रहे है। हालाँकि यह भी सच है कि तिरंगा यात्रा में तिरंगा काफ़ी सिद्दत से ढूँढना पड़ता है जबकि भगवा झंडा हर जगह दिखायी देता है। एक ऐसी ही यात्रा मुज़फ़्फ़रनगर में आयोजित की गयी। जी हाँ, वो ही जगह जहाँ 2013 में दंगा हुआ और 2014 में भाजपा की केंद्र में सरकार बन गयी।

उसी जगह पर यह यात्रा निकाली गयी। इस दौरान हिंदू महासभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पंडित अशोक चौबे ने विवादित बयान देते हुए कहा,’हमारी रणनीति है कि सभी हिन्दुओं को सशस्त्र बनना चाहिए। अगर कोई हिन्दू 100 रुपये कमाता है तो 20 रुपये का हथियार खरीदना चाहिए। नहीं तो राष्ट्र की रक्षा नहीं हो सकती।” उन्होंने कहा, “शस्त्रेण रक्षिते राष्ट्रे शास्त्र चिंता प्रवर्तते।” यानी राष्ट्र की चिंता के लिए शास्त्र जरूरी है और शास्त्र की चिंता के लिए शस्त्र जरूरी है।’

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