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नई दिल्ली – स्वतंत्र टिप्पणीकार राजीव शर्मा कोलसिया ने इस्लाम धर्म की सबसे पवित्र पुस्तक कुरान का मारवाड़ी में अनुवाद करके एक मिसा कायम की है। राजस्थान निवासी राजीव शर्मा ने जानकारी देते हुए बताया कि आपको यह जानकारी देते हुए मुझे बहुत खुशी हो रही है कि मैंने पवित्र क़ुरआन का मारवाड़ी में अनुवाद किया है।

उन्होंने इस अनुवाद की वजह बताते हुए कहा कि यह अनुवाद दो वजह से बहुत खास है। पहली, यह क़ुरआन का अनुवाद है। दूसरी, यह क़ुरआन का मारवाड़ी में किया गया विश्व का पहला अनुवाद है। अगर हम पिछले करीब चौदह सौ साल का इतिहास देखें तो क़ुरआन के मारवाड़ी अनुवाद का कहीं जिक्र नहीं मिलता।

यादगार रहा सफर

राजीव ने बताया कि मेरी अनुवाद की यह यात्रा बहुत सुंदर और यादगार रही है। मैंने क़ुरआन के हर शब्द को बहुत ध्यान से और बार—बार पढ़कर, समझकर उसका मूल भाव मारवाड़ी में लेने की कोशिश की है। मुझे इस काम में करीब तीन साल का वक्त लगा है। मैंने दिसम्बर 2014 में यह अनुवाद शुरू किया था और बहुत धीमी गति से इसे जारी रखा। पिछले छह महीने (जुलाई 2017) से मैंने सब काम छोड़कर पूरा ध्यान इसी में लगाया। रब का शुक्र है कि इस दौरान कोई परेशानी नहीं आई और यह कार्य संपन्न हुआ।

क़ुरआन का ही अनुवाद क्यों?

उन्होंने कहा कि मेरे कई मित्र पूछ सकते हैं कि क़ुरआन का ही मारवाड़ी अनुवाद क्यों! वास्तव में इसकी कोई एक वजह नहीं है, लेकिन सबसे बड़ी वजह है हमारे समाज में बढ़ती नफरत। आपको नफरत चेक करने के लिए कोई पैमाना लाने की जरूरत नहीं। किसी भी समाचार वेबसाइट के फेसबुक पेज पर चले जाइए और लोगों के कमेंट पढ़कर देख लीजिए। आप पाएंगे कि आज हमने पूरी ताकत एक—दूसरे को नीचा दिखाने में लगा रखी है।

राजीश शर्मा ने बताया कि स्थिति इतनी विचित्र है कि जिस किताब के हर पृष्ठ पर आपको शांति, मानवता, दया, भाईचारा और समझदारी की बातें मिलेंगी, आज लोग अनजाने में उसके लिए कई भ्रम पाले बैठे हैं। इसके बाद प्रतिक्रिया का दौर शुरू होता है और हम सोशल मीडिया को झगड़े का मैदान बना लेते हैं।

उन्होंने कहा कि हम एक देश में रहते हैं, इसलिए यह जरूरी है कि एक—दूसरे के धर्म को जानें और उनका सम्मान करना सीखें। आपसी टकराव और गलतफहमियों से देश कमजोर होता है। मुझे याद है जब 9/11 की घटना हुई थी तो अखबारों और चाय की दुकानों पर आतंकवाद और क़ुरआन के संबंधों की चर्चा बहुत गर्म थी। उन दिनों मैं दसवीं कक्षा का विद्यार्थी था और एक लाइब्रेरी भी चलाया करता था। संयोगवश मेरी लाइब्रेरी में कई धर्मग्रंथ थे, क़ुरआन भी था। वह चर्चा सुनकर मैं लाइब्रेरी में आया और क़ुरआन पढ़ने लगा।

राजीव ने कहा कि मुझे उसमें ऐसी कई—कई आयतें मिलीं जो सदाचार, शांति और नैतिकता की बात कहती हैं। एक आयत (5/32) में तो यह भी कहा गया था कि अगर किसी ने बेगुनाह की हत्या की तो उसका यह पाप पूरी मानवता की हत्या के बराबर है। यदि उसने किसी की जान बचाई तो यह पूरी मानवता की रक्षा करने के बराबर है। उसके बाद मैंने क़ुरआन को पढ़ना जारी रखा। वर्षों बाद (2014 में) मेरे दिल में खयाल आया कि क़ुरआन की आयतों का अर्थ मारवाड़ी में हो तो यह और ज्यादा सुंदर और सरल होगा। ग्रामीण परिवेश के लोग इसे आसानी से पढ़ सकेंगे। इसके बाद मैं मारवाड़ी अनुवाद में जुट गया।

राजीव ने बताया कि मैंने आज (तारीख 2 दिसम्बर 2017) को क़ुरआन का यह अनुवाद पूरा किया है। अब मैं किसी पब्लिशर की तलाश में हूं। दुआ करें कि यह जल्द पुस्तक के आकार में आप सबके घरों और दिलों में भी जगह पाए। एक बात और … रुकना और आराम करना मेरा मकसद नहीं है, मुझे पसंद भी नहीं है। अब मैं उस लाइब्रेरी को आगे बढ़ाना चाहता हूं और पूरे भारत में उसकी शाखाएं खोलना चाहता हूं ताकि अच्छी किताबों के जरिए स्कूली विद्यार्थियों में एक स्वस्थ, बेहतर और ऊंची सोच पैदा हो। क्या आप इस मुहिम के लिए मुझे सुझाव देंगे?

राजीव ने कहा कि आजादी के बाद हमने बैंकों की अहमियत तो पहचानी लेकिन लाइब्रेरी की अहमियत भूलते गए। याद कीजिए वो घटना जब हज़रत जिबरील (अलैहि.) यह आयत लेकर आए — पढ़ो अपने रब के नाम से जिसने तुम्हें पैदा किया। (96/1) यह आगाज पढ़ाई के हुक्म से हुआ था

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