दिल्ली दंगों से जुड़े मामले में हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस की जांच रिपोर्ट को रद्दी का टुकड़ा करार दिया। साथ ही पुलिस को भी कड़ी फटकार लगाई।

जस्टिस मुक्ता गुप्ता की अदालत ने कहा कि यह सतर्कता जांच चोरी के किसी मामले की एक समान्य जांच से भी बदतर है। जांच पर सवाल उठाते हुए अदालत ने कहा कि आप एक वरिष्ठ अधिकारी हैं, आपने जांच की, आपने किससे पूछताछ की? फाइलें कहां भेजी गई थी? कौन उन्हें दिल्ली सरकार और गृह मंत्रालय से वापस ले कर आया?

कोर्ट ने फटकार लगाते हुए कहा कि रिपोर्ट में कुछ भी नहीं है। यह सड़क पर पड़े दस्तावेज नहीं हैं। जामिया मिल्लिया इस्लामिया के छात्र आसिफ इकबाल तन्हा के इकबालिया बयान मीडिया में लीक होने के मामले में अदालत छात्र द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा था। जिसमें जांच एजेंसी द्वारा दर्ज बयान को मीडिया में लीक किये जाने पर पुलिस पर कदाचार के आरोप लगाए गए थे।

अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि पुलिस यह पता लगाने में अक्षम है कि क्या हुआ तो फिर उन्हें कड़ा आदेश जारी करना होगा जिससे पता चल सके कि आखिर मीडिया में जानकारी कहां से लीक हुई। अदालत ने कहा पुलिस ने रिपोर्ट में याची के आरोप निराधार है जबकि आरोप पुष्ट हैं और आपको पता करना है कि ये किसने किया।

सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस की तरफ से पेश हुए अधिवक्ता अमित महाजन ने कहा कि पुलिस भी मीडिया में रिपोर्ट लीक होने के पक्ष में नहीं है और वह ऐसा नहीं चाहती। अदालत ने उनके तर्क पर असहमति जताते हुए कहा कि यह इच्छा की बात नहीं है, यह आरोपी के खिलाफ है। जांच की निष्पक्षता के लिए इसे नियंत्रित करने की जरूरत है।

वहीं, तन्हा की तरफ से पेश हुए अधिवक्ता सिद्धार्थ अग्रवाल ने कहा कि अब पुलिस सिर्फ और सिर्फ अपनों को बचाने में लगी है। तन्हा को दिल्ली दंगा मामले में विभिन्न धाराओं के तहत गिरफ्तार किया गया था। तन्हा ने पुलिस द्वारा उनके कथित इकबालिया बयान को मीडिया में लीक करने के खिलाफ याचिका दायर की थी।