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दिल्ली हाईकोर्ट ने हजरत निजामुद्दीन औलिया दरगाह में प्रवेश को मामले को लेकर नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने अनुमति देने के लिए दिशानिर्देश जारी करने की मांग करने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार, दिल्ली पुलिस और निजामुद्दीन औलिया ट्रस्ट को नोटिस जारी किया है।

ऐसे में बता देना जरूरी है कि दरगाह परिसर में महिलाएं हर कहीं जा सकती हैं। महिलाओं के सिवाय सूफी हजरत निजामुद्दीन की मजार के करीब जाने पर रोक है। ये रोक इस्लामिक नियमों के अनुसार है। इस्लाम में महिलाओं के  कब्रस्तान जाने और कब्रों की जियारत पर मनाही है।

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हजरत निजामुद्दीन औलिया एक सूफी संत थे। जो चिश्ती सिलसिले से है। जिसकी शुरुआत हजरत ख्वाजा गरीब नवाज ने की थी। हजरत निजामुद्दीन करीब 85 सालों तक दिल्ली में यहीं रहे। ये 12वीं सदी से लेकर 13वीं सदी के बीच का समय था। 03 अप्रैल 1325 में उन्होंने आखिरी सांसें लीं। उनके अनुयायियों की बड़ी तादाद थी।

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वो उत्तर प्रदेश के बदायूं में पैदा हुए थे और फिर बचपन में ही पिता के निधन के बाद कुछ बरसों बाद दिल्ली आ गए। धीरे धीरे उनका प्रभाव यहां बढ़ने लगा। इस दरगाह की संरचना को 1562 में बनाया गया। अबुल फजह की आइन ए अकबरी में निजामुद्दीन औलिया का विस्तार से जिक्र किया गया है।

उन्होंने अपने जीवनकाल में दिल्ली में सात बादशाहों को गद्दी पर बैठते-उतरते देखा। जिसकी भविष्यवाणी उन्होने खुद कि थी। इस दौरान वे कभी-भी किसी भी राजा के दरबार में हाजिर नहीं हुए।

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