पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने 2002 के गुजरात दंगों से जुड़ी लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) जमीर उद्दीन शाह की पुस्तक ‘द सरकारी मुसलमान’ का विमोचन किया। इस मौके पर उन्होने तत्कालीन केंद्र सरकार की मंशा पर बड़े सवाल खड़े किए।

अंसारी ने शनिवार को सवाल किया कि तत्कालीन केंद्र सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 355 का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जबकि उसके रक्षा मंत्री मौके पर थे। बता दें कि जमीर उद्दीन शाह ने सेना की उस डिविजन का नेतृत्व किया था जिसने गुजरात में दंगों को शांत कराया था।

उन्होंने कहा, ‘‘पूर्व राष्ट्रपति के आर नारायणन ने 2005 में एक मलयालम साप्ताहिक के साथ साक्षात्कार में सरकार के साथ अपनी आपत्ति का खुलासा किया था, मैं उन्हें (नारायणन को) उद्धृत करता हूं…सेना भेज दी गई थी लेकिन उसे गोली चलाने का अधिकार नहीं दिया गया था। और, गुजरात दंगों के पीछे केंद्र और राज्य सरकार की संलिप्तता वाला एक षड्यंत्र था।’’

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पूर्व उपराष्ट्रपति अंसारी ने यह भी कहा कि ‘‘आतंकवाद का कोई सैन्य हल’’ नहीं है क्योंकि सामान्य स्थिति लोगों का दिल और दिमाग जीतकर ही बहाल की जा सकती है।  अंसारी ने कहा, ‘‘नागरिक प्रशासन की प्रारंभिक प्रतिक्रिया सुस्त थी, कर्फ्यू का आदेश दे दिया गया था लेकिन वह लागू नहीं हुआ था, शांति समितियां आहूत करने का कोई प्रयास नहीं किया गया और पुलिस का रवैया पक्षपातपूर्ण था’’

‘द सरकारी मुसलमान’ पुस्तक में आरोप लगाया गया है कि राज्य में दंगे शुरू होने के बाद अहमदाबाद में पहुंची सेना के लिए परिवहन और अन्य साजोसामान सहायता ‘‘एक दिन बाद पहुंची’’ थी।

लेफ्टिनेंट जनरल शाह ने कार्यक्रम में कहा कि उन्होंने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडिस से 28 फरवरी की देर रात में मुख्यमंत्री आवास पर मुलाकात की थी और परिवहन एवं अन्य साजोसामान का सहयोग मांगा था।

उन्होंने कहा, ‘‘हालांकि परिवहन सुविधा दो मार्च को मिली. मेरे फार्मेशन से सैकड़ों अधिकारी इस पर बोल सकते हैं और बटालियन की युद्ध डायरी हैं।’’

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