बुधवार को सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश रूमा पाल ने कहा कि अदालतों को सक्रिय रूप से समानता और गैर-भेदभाव के संवैधानिक सिद्धांतों की कसौटी पर भेदभावपूर्ण और अन्यायपूर्ण निजी कानूनों की समीक्षा करनी चाहिए.

न्यायमूर्ति पाल ने कहा कि सरकार के विपरीत, अदालतों की अराजनैतिक प्रकृति ने उन्हें निजी कानूनों में सुधार के मामलों में अधिक विश्वसनीयता बना दिया. समान नागरिक संहिता पर व्याख्यान देते हुए न्यायमूर्ति पाल ने कहा कि आदर्श सुधार हर निजी कानून के अंदर होने चाहिए ना की समान कानून हर एक धर्म और समुदाय पर लागू कर देना चाहिए.

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हालांकि, उन्होंने कहा मुस्लिम पर्सनल लॉ में लिंग भेद हैं तो उसे दूर किया जाना चाहिए. साथ ही मुस्लिम महिलाओं को भी समान अधिकार  को देकर ट्रिपल तलाक और बहुविवाह की भेदभावपूर्ण व्यवहार को भी दूर किया जा सकता है.

उन्होंने आगे कहा कि अनुच्छेद 14 और 15 के तहत समानता और गैर-भेदभाव तथा अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा के साथ जीने का अधिकार के मानदंडों को सुनिश्चित करना चाहिए, उन्होंने कहा, सामान आचार सहिंता को लागू करने से बहुसंस्कृति पर कोई असर नहीं होना चाहिए.

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