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दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग (डीएमसी) की एक फैक्ट फाइंडिंग कमेटी को ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिला है, जिससे यह जाहिर हो कि आतंकवादी संगठन के धन का इस्तेमाल हरियाणा के पलवल में मस्जिद बनाने के लिए किया गया। आयोग ने बुधवार को इस सिलसिले में अपनी एक रिपोर्ट जारी की है।

मानवाधिकार कार्यकर्ता और आयोग के सलाहकार ओवैस सुल्तान के नेतृत्व में चार सदस्यीय समिति का गठन मीडिया में आई उन खबरों पर गौर करने के लिए किया गया था, जिनमें राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) के अनाम सूत्रों के हवाले से दावा किया गया था कि पाकिस्तान आधारित आतंकवादी हाफिज सईद के फलाह-ए-इंसानियत फाउंडेशन (एफआईएफ) से आए धन का इस्तेमाल मस्जिद के निर्माण में किया गया होगा।

ओवैस ने कहा, ‘कमेटी को ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिला है जिससे यह कहा जा सके कि पलवल के उत्तवार में खुलफा-ए-राशिदीन मस्जिद के निर्माण के लिए आतंकवादियों से धन मिला था।’ गौरतलब है कि मीडिया में आई खबरों में एनआईए के अनाम सूत्रों ने यह आरोप लगाया था। कमेटी ने उस गांव का 20 अक्टूबर को दौरा किया, जहां यह मस्जिद बनाई गई है।

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एनआईए ने प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के मुखौटा संगठन फलाह-ए-इंसानियत फाउंडेशन से जुड़े आतंकी मॉड्यूल की जांच के लिए जुलाई में एक मामला दर्ज किया था। एफआईआर के मुताबिक दिल्ली में रह रहे कुछ लोगों को इस संगठन के विदेश स्थित सदस्यों से धन प्राप्त हो रहा है और उसका इस्तेमाल आतंकी गतिविधियों में हो रहा है।

ओवैस ने कहा कि यह मस्जिद तबलीगी जमात से संबद्धित है जबकि लश्कर-ए-तैयबा और एफआईएफ सलाफी विचारधारा से संबद्धित है। ये दोनों एक दूसरे की शिक्षाओं और परंपराओं से सहमति नहीं रखते हैं। उन्होंने कहा कि इस तरह उनके बीच तालमेल होने का या मस्जिद के लिए धन दिए जाने का कोई सवाल ही नहीं उठता है।

कमेटी ने दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष से यह सिफारिश की कि वह एनआईए की जांच में हुई प्रक्रियागत चूकों के बारे में केंद्रीय गृह सचिव को पत्र लिख कर जानकारी दें। साथ ही, सभी मीडिया संगठनों एवं एजेंसियों को यह परामर्श जारी किया जाए कि वे कथित आतंकवाद से जुड़े मामलों की रिपोर्टिंग में सावधानी बरतें।

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