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गुजरात के चर्चित सोहराबुद्दीन शेख फर्जी मुठभेड़ मामले मी डीआईजी डीजी बंजारा और अहमदाहबाद क्राइम ब्रांच के डीएसपी नरेंद्र के अमीन को जमानत देने वाले बॉम्बे हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस अभय एम थिप्से ने सवाल खड़े करते हुए जज बीएच लोया की मौत पर संदेह प्रकट किया है.

थिप्से ने इंडियन एक्सप्रेस को दिए इंटरव्यू में कहा है कि इस मामले में जिस तरह हाई प्रोफाइल अभियुक्त बरी होने के तरीके, न्यायिकप्रक्रिया में “अनियमितता” और गवाहों पर दबाव और सबूतों से “छेड़खानी” उससे “न्यायप्रक्रिया की विफलता” का पता चलता है. इंडियन एक्सप्रेस से खास बातचीत में जस्टिस थिप्से ने कहा कि उन्हें इस मामले में कुछ गड़बड़ी नजर आई है जिस पर हाईकोर्ट को जांच के आदेश देने चाहिए. उन्होंने बताया, जब उन्होंने सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ में दिए गए आदेशों को पढ़ा तो पाया कि उसमें कई असामान्य चीजें हैं.

जस्टिस थिप्से ने एक्सप्रेस से कहा कि बॉम्बे हाई कोर्ट को मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए इस मामले की फिर से सुनवाई करनी चाहिए. उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि अदालत मानती है कि सोहराबुद्दीन का अपहरण किया गया और उनका मुठभेड़ सुनियोजित था फिर भी वरिष्ठ पुलिस अधिकारी बरी हो गये. उन्होंने कहा, मामले से जुड़े कई पहलू संदेह पैदा करते हैं.

जज लोया की मौत पर उन्होंने कहा कि वह अप्राकृतिक था. इसके साथ ही जस्टिस थिप्से ने जज लोया की सीडीआर (फोन कॉल डिटेल्स रिपोर्ट) को देखा जाना चाहिए. उन्होंने जज लोया की नियुक्ति और उन्हें हटाए जाने पर भी सवाल खड़े किये.  उन्होंने कहा कि हाई कोर्ट में रजिस्ट्री नियुक्त होने पर आमतौर पर किसी को भी तीन साल से पहले नहीं हटाया जाता है. लेकिन जज लोया को तीन साल का टर्म पूरा होने से पहले ही बॉम्बे हाईकोर्ट के रजिस्ट्री से हटाकर सीबीआई कोर्ट का स्पेशल जज बना दिया गया.

जस्टिस थिप्से ने कहा कि जज लोया की इस पद पर तैनाती से पहले जज जे टी उतपत को आनन-फानन में हटाया गया था. उन्होंने भी तीन साल का कार्यकाल पूरा नहीं किया था. जस्टिस थिप्से के मुताबिक ऐसी विशेष परिस्थितियों में भी सुप्रीम कोर्ट को नहीं बताया गया था.

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