कुनन-पोशपोरा की घटना को लेकर लोगों में आज भी गुस्सा है. लोग समय-समय पर इसके विरोध में प्रदर्शन करते रहते हैं

कुनन-पाशपोरा कश्मीर के कुपवाड़ा जिले का वो हिस्सा जो 23 और 24 फरवरी के आने के साथ ही सहम जाता हैं. इन दिनों हर साल सारा गांव मातम में डूब जाता है. उस रोज शायद ही गांव में कोई चूल्हा जलाता है.

तकरीबन 26 साल पहले कुनन और पाशपोरा दो गांवों में, 40 से ज्यादा महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ था, इस घिनोने काम का आरोप किसी और पर नही बल्कि भारतीय सेना पर लगा था. 26 साल गुजर जाने के बाद भी ये महिलाए न्याय के लिए तरस रही हैं. 2013 में पांच कश्मीरी महिलाओं- इस्सर बतूल, इफराह बट, समरीना मुश्ताक, मुनाज़ा राशिद और नताशा राथर ने इस बर्बर घटना को कलमबद्ध किया और नाम दिया किताब ‘डू यू रिमेंबर कुनन पोशपोरा?’ बीते साल जनवरी में इसका लोकार्पण जयपुर साहित्य महोत्सव में हुआ वहीं श्रीनगर में किताब का लोकार्पण 23 फरवरी को हुआ था.

किताब लिखने वाली नताशा, इस्सर और समरीना सामाजिक कार्यकर्ता हैं. मुनाज़ा वकील हैं, वहीं इफराह ‘अंतरराष्ट्रीय संबंधों’ की पढ़ाई कर रही हैं. भारत के इस सबसे बड़े सामूहिक बलात्कार कांड में  न्याय तो दूर की बात है सरकार इन अत्याचारों को सामने लाने के प्रयासों के प्रति भी निष्ठुर बनी रही. इस को लेकर लेखिका इस्सर कहती हैं, ‘एक ऐसे देश में जो सारी दुनिया में खुद के ‘सबसे बड़ा लोकतंत्र’ होने का दम भरता है, वहां सेना द्वारा किए गए बलात्कारों को माफ कैसे किया जा सकता है?’

डू यू रिमेंबर कुनन-पोशपोरा किताब की लेखिकाएं नताशा राथर, इफराह बट, मुनाज़ा राशिद, समरीना मुश्ताक और इस्सर बतूल (बाएं से दाएं)

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2013 में एक कार्यक्रम के दौरान इन लेखिकाओं की मुलाकात बलात्कार की शिकार हमीदा (बदला हुआ नाम) से हुई. हमीदा ने अपनी कहानी यूं बताई, ‘उस रात जब सेना मेरे पति को उठा ले गई तब घर में मैं अपने दो छोटे बच्चों के साथ अकेली थी. सैनिकों ने मेरी गोद से मेरे छोटे बेटे को छीन लिया और मेरे कपड़े फाड़कर मुझे जमीन पर धकेल दिया… मेरा बेटा ये सब देख लगातार रो रहा था, वहीं मुझे कुछ पता नहीं था कि उन्होंने मेरे दूसरे बेटे को कहां रखा था. मेरे गिड़गिड़ाने के बावजूद उन्होंने मुझे पूरी रात नहीं जाने दिया.’ 1991 की उस भयावह रात को बयान करते हुए हमीदा रो पड़ती हैं. उस वक्त वे केवल 24 वर्ष की थीं.

भारत के इस सबसे बड़े सामूहिक बलात्कार कांड की शिकार हमीदा को न्याय की उम्मीद तब तक नहीं थी जब तक कार्यकर्ताओं के समूह ने 2013 में दोबारा न्याय की लड़ाई शुरू नहीं कर दी. न्याय तो दूर की बात है सरकार इन अत्याचारों को सामने लाने के प्रयासों के प्रति भी निष्ठुर रही. 2012 में पब्लिक सर्विस ब्रॉडकास्टिंग ट्रस्ट (पीएसबीटी) के बैनर तले और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से सहायता प्राप्त इस घटना पर आधारित डाॅक्यूमेंट्री ‘ओशन आॅफ टियर्स’ को प्रदर्शित करने के लिए भी संघर्ष करना पड़ा.  कश्मीर विश्वविद्यालय और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में फिल्म की स्क्रीनिंग को दो बार रोका गया. पीएसबीटी द्वारा यू-ट्यूब पर अपलोड किए गए इस डाॅक्यूमेंट्री के सात मिनट के ट्रेलर को अपलोड करने के दो महीने बाद हटा दिया गया. इस दौरान इसे 1,49,000 लोगों ने देखा था.

कुनन और पोशपोरा में 23 फरवरी, 1991 की उस भयावह रात को कश्मीर में भुलाया नहीं जा सकता. नई पीढ़ी अपने परिवार की महिलाओं के साथ हुई ज्यादती के सदमे के साथ बड़ी हो रही है. यहां के लोग बताते हैं कि  पड़ोसी गांवों के लोग इन दो गांवों की बेटियों को अच्छी निगाह से नहीं देखते और उनके बेटे अपने साथियों और शिक्षकों के कटाक्ष सुनकर लगातार स्कूल छोड़ रहे हैं. उन यादों के घाव अब तक हरे हैं और दुखते हैं. इस्सर बताती हैं, ‘23 फरवरी को हर साल सारा गांव मातम में डूब जाता है. उस रोज शायद ही गांव में कोई चूल्हा जलाता है.’

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