Friday, October 22, 2021

 

 

 

अच्छा होता अगर मैं गुजरात दंगों में ही मर गया होता

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गुजरात हिंसा को बीते 14 साल हो गए हैं लेकिन एक चेहरा ऐसा है जो जिंदा तो है लेकिन फिर भी आहत है। यह चेहरा है कुतुबुद्दीन अंसारी का। अंसारी की परेशानी ये है कि उनकी तस्वीर दंगों के 14 साल बाद भी पार्टिोयों द्वारा अपनी राजनीति के लिए प्रयोग में लाई जा रही है।

उन्होंने असम और पश्चिम बंगाल चुनाव प्रचार में कांग्रेस द्वारा अपनी तस्वीर प्रयोग करने पर उन्होंने नाराजगी जताते हुए कहा कि मेरी तस्वीर देखकर हर कोई मुझपर संदेह की नजरों से देख रहा है। वहीं कुछ पार्टी (बीजेपी) के लोग यह समझते हैं कि मैं ये सब जानकर करवाता हूं। लेकिन मुझे तो इसके बारे में कुछ भी नहीं पता है।

अंसारी ने कहा, ‘मैं 43 साल का हूं और पिछले 14 सालों में राजनीतिक दलों, बॉलीवुड और यहां तक कि आतंकी संगठनों ने मेरा प्रयोग और दुरुपयोग किया। इससे तो अच्‍छा होता कि मैं 2002 में ही मर गया होता, क्‍योंकि मैं अपने बच्‍चों के उस सवाल का जवाब नहीं दे पाता कि पापा हम जब भी आपकी तस्‍वीर देखते हैं, उसमें आप रोते और दया की भीख मांगते दिखते हैं।’

अंसारी का चेहरा 2002 में गुजरात हिंसा के पीड़ितों का फेस बन गया था, जिसे देखकर हर किसी के आंखें नम हो गई थीं। समय बीता और समय के साथ उनका चेहरा भी भुला दिया गया लेकिन एक बार भी उनका चेहरा पोस्टरों पर दिखने लगा है। वो भी सिर्फ चुनावी रोटियां सेंकने के लिए। दरअसल, कांग्रेस ने असम और पश्चिम बंगाल में अपने चुनाव प्रचार के पोस्टर में अंसारी की उसी तस्वीर का प्रयोग किया है। और लिखा है, ‘क्या मोदी के गुजरात का मतलब सिर्फ विकास है? क्या आप असम को गुजरात बनाना चाहते हैं। फैसला आपके हाथ में है।’

दर्जी के तौर पर काम करने वाले अंसारी की कमाई इतनी भी नहीं है कि वो अपनी पत्नी और तीन बच्चों को अच्छी तरह पाल सकें। वो इस बात से आहत हैं कि उनकी तस्वीर पार्टियां अपने राजनीतिक रोटियों के लिए इस्तेमाल कर रही हैं जिससे उनका जीवन कठिन होता जा रहा है। अंसारी ने कहा कि वो गुजरात में ही शांति से रहना चाहते हैं। (hindi.news24online.com)

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