संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत का हर दूसरा ग़रीब शख्स आदिवासी और तीसरा शख्स दलित तथा मुस्लिम है। 27% बहुआयामी गरीबी (जिसमें आय, स्वास्थ्य, सुविधाएं आदि का पैमाना शामिल है) के साथ भारत विश्व में पहले स्थान पर है।

यूएन के डेवलपमेंट प्रोग्राम (UNDP), ऑक्सफोर्ड पॉवर्टी और ह्यूमन डेवलपमेंट इनिशिएटिव (OPHI) ने 2018 का आंकड़ा निकाला। जिसके मुताबिक वैश्विक स्तर पर बहुआयामी ग़रीबी का सूचकांक दलित, आदिवासी और मुसलमानों के लिए सही नहीं है।

इसी रिपोर्ट में बताया गया है कि साल 2018 में भारत का हर दूसरा बहुआयामी ग़रीब व्यक्ति शेड्यूल ट्राऊ (ST) और हर तीसरा शख्स शेड्यूल कास्ट (SC) तबके से है। इसी तरह हर तीसरा मुस्लिम भी सभी प्रकार की ग़रीबी से घिरा हुआ है। इसमें बहुआयामी ग़रीबी से तात्पर्य व्यक्ति के धन-संपदा के साथ-साथ, पोषण, स्वास्थ्य, शिक्षा, साधन और जीवन स्तर शामिल है।

इस रिपोर्ट में देश के 640 ज़िलों को शामिल किया गया है और इसका 2006 से 2016 के बीत बीते 10 सालों के साथ तुलना की गई है। रिपोर्ट के मुताबिक देश का तक़रीबन 50 फिसदी आदिवासी वर्ग ग़रीब है। जबकि, 33 फीसदी दलित और 33 फीसदी मुसलमान भी इसी श्रेणी में शामिल है। कुल मिलाकर इस रिपोर्ट में बताया गया है कि कि भारत में दुनिया की सबसे ज्यादा ग़रीब आबादी रहती है और इसका प्रतिशत 27 है। सबसे ज्यादा चिंता वाली बात यह है कि देश की 8.6 फीसदी बच्चों की आबादी ‘भयंकर ग़रीबी’ की चपेट में है। भारत में सवर्ण जातियां हालांकि काफी बेहतर हालात में हैं।

रिपोर्ट में एमपीआई के आधार पर सवर्ण जातियों में 15 फीसदी पर बहुआयामी गरीबी हावी है। हालांकि, देश में तरक्की का आंकड़ा 2006 के मुकाबले आज कुछ बेहतर है। पहले जहां 80 फीसदी शेड्यूल ट्राइब गरीबी रेखा से नीचे थे, वह अब 50 फीसदी है।इसके अलावा राज्यों के आधार पर बात करें तो बिहार और झारखंड देश सबसे ज्यादा ग़रीब हैं। बिहार में 53 फीसदी बहुआयामी ग़रीब है, वहीं झारखंड में 45 फीसदी हैं। देश में केरल में ग़रीब काफी कम हैं। यहां पर सिर्फ 1 फीसदी लोग ही बहुआयामी गरीबी की चपेट में हैं।

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