Wednesday, December 1, 2021

अयोध्या मामले की सुनवाई के दौरान अदालत में हुई गरमागरम बहस, जजों को लेना पड़ा माइक का सहारा

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नई दिल्ली | शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या मामले की सुनवाई शुरू हुई. इस दौरान अपने पक्षकारो के लिए दलील दे रहे वकीलों के बीच गरमागरम बहस देखने को मिली. हालात यहाँ तक पहुँच गए की जज को अपनी आवाज उन तक पहुँचाने के लिए माइक का सहारा लेना पड़ा. दरअसल यूपी सरकार और रामलला विराजमान, कोर्ट से जल्द सुनवाई की मांग कर रहे थे जबकि विपक्षी वकीलों की दलील थी की अभी मामला तैयार नही है इसलिए जल्द सुनवाई नही होनी चाहिए.

शुक्रवार को खचाखच भरी कोर्ट में अयोध्या मामले को लेकर सुनवाई शुरू हुई. मामले की सुनवाई करीब दो बजे शुरू होनी थी लेकिन डेढ़ बजे ही कोर्ट खचाखच भर चूका था. आखिर भरे भी क्यों न? हिंदुस्तान के सबसे लम्बे चलने वाले और सबसे विवादित मामले की सुनवाई जो होनी थी. ठीक दो बजे जस्टिस दीपक मिश्रा, अशोक भूषण और अब्दुल नजीर कोर्ट में पहुंचे. सबसे पहले यूपी सरकार के वकील एएसजी तुषार मेहता ने अपनी दलील कोर्ट के सामने रखी.

उन्होंने कोर्ट से आग्रह किया की कोर्ट को जल्द सुनवाई की तारीख देनी चाहिए. इसके अलावा हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ दाखिल याचिकाओं पर पहले सुनवाई करने की भी अपील की गयी. तुषार मेहता की दलील का रामलला के वकील  सीएस वैद्यनाथन ने भी समर्थन किया. लेकिन सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड , मुहम्मद हाशिम और निर्मोही अखाडा के वकीलों ने मामले की जल्द सुनवाई का विरोध करते हुए कहा की अभी सभी दस्तावेजो का अनुवाद नही हुआ है इसलिए जल्द सुनवाई नही होनी चाहिए.

सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के वकील अनूप जार्ज चौधरी, कपिल सिब्बल और राजीव धवन का कहना है की मामले के दस्तावेज संस्कृत, हिंदी, उर्दू, पाली, फारसी, गुरुमुखी समेत आठ भाषाओ में है. इस पर वैधनाथन ने तुषार मेहता को सलाह दी जो पक्षकार जिस दस्तावेज का हवाला दे रहे है उन्हें ही उसका अनुवाद कराकर कोर्ट में पेश करना चाहिए. वैधनाथन का सुझाव कोर्ट को अच्छा लगा लेकिन चौधरी का सवाल था की विपक्षी पैरोकार के अनुवाद पर सवाल उठ सकता है.

इस पर कोर्ट ने कहा की ऐसा होने पर हम अनुवाद को विशेषज्ञों के पास भेज सकते है. इस पर कोर्ट ने दस्तावेजो के अनुवाद में लगने वाले समय के बारे में पुछा तो रामलला की और से चार सप्ताह, सुन्नी सेंट्रल वक्फ की और से चार महीने का समय माँगा गया. जबकि निर्मोही अखाडा के वकील का कहना था की वो अभी अंदाजा लगाकर नही बता सकते. बाद में कोर्ट ने दस्तावेजो के अनुवाद के लिए 12 सप्ताह का समय दिया. इस दौरान दोनों पक्षों के वकीलों की आवाज ऊँची होने पर जस्टिस अशोक भूषण को सामने लगे माइक का सहारा लेना पड़ा.

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