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देश में तीन तलाक पर कानून बनाने की मोदी सरकार की कोशिश को लेकर जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष महमूद मदनी का कहना है कि तीन तलाक का हल कानून कतई नहीं हो सकता. इसका जो भी समाधान निकालेगी वो सोसाइटी शरीयत से निकालेगी.

उन्होंने कहा कि  इस कानून के पीछे मुसलमानों पर किसी न किसी तरह यूनिफार्म सिविल कोड थोपने का प्रयास किया जा रहा है. इसका उद्देश्य मुस्लिम महिलाओं के इंसाफ के बजाए मुसलमानों को धार्मिक स्वतंत्रता से वंचित करना है. इस कानून के पीछे मुसलमानों पर किसी न किसी तरह यूनिफार्म सिविल कोड थोपने का प्रयास किया जा रहा है.

मदनी ने नाराजगी जताते हुए कहा कि आज देश में तीन तलाक को इस तरह पेश किया जा रहा है जैसे हर मुस्लिम लड़की को तीन तलाक दिया ही जा रहा है. सही बात तो ये है कि शरीयत में सिर्फ तुरंत वाले तीन तलाक को ही गलत नहीं बताया गया. बल्कि हर तरह के तलाक पर नाराजगी जाहिर की गई है. ये तो उस मजबूरी में दिया जाता है जब पति-पत्नी का साथ रहना मुश्किल हो जाता है. उनका कहना है कि यदि यह कानून बना तो दहेज विरोधी कानून की तरह इसका भी गलत फायदा उठाया जा सकता है.

हज यात्रा के दौरान महरम के मसले पर उन्होंने कहा, बिना महरम के हज यात्रा पर जाने के मैं खिलाफ नहीं हूं. क्योंकि हमारे यहां चार स्कूल ऑफ थॉट हैं. और उसमे से एक स्कूल शाफी बिना महरम के हज यात्रा की इजाजत देता है. शाफी स्कूल के मानने वाले केरल और कोंकण में बहुत हैं. तो फिर कुछ लोगों का हक क्यों मारा जाए. इसलिए सऊदी अरब सरकार ने भी इसमे छूट दे दी है. ये कदम तो सऊदी अरब सरकार ने उठाया है, देश में तो इस पर सिर्फ राजनीति ही हो रही है.

उन्होंने सभी मुसलमानों से अपील की है कि वे तलाक-ए-बिद्दत से पूरी तरह ऐतराज करें और शरीयत के हुक्म के मुताबिक निकाह, तलाक और अन्य पारिवारिक मामलों को तय करें. ताकि इस बहाने से सरकारों को हस्तक्षेप करने का मौका न मिल सके.

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