Wednesday, October 20, 2021

 

 

 

दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग ने जारी की रिपोर्ट – सुनियोजित थी हिंसा, बीजेपी नेताओं ने भड़काई

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दिल्ली के उत्तर-पूर्वी ज़िले में फ़रवरी में हुए मुस्लिम विरोधी दंगों को लेकर दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग ने अपनी रिपोर्ट पेश की है। जिसमे न केवल दंगों को सुनियोजित करार दिया गया बल्कि इन दंगों के पीछे बीजेपी नेताओं को जिम्मेदार बताया गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि 23 फरवरी को बीजेपी नेता कपिल मिश्रा के भड़काऊ भाषण के बाद हिंसा शुरू हुई थी। इस दौरान मुस्लिम समुदाय की संपत्तियों को लूट लिया गया।

कैसे शुरू हुए दंगे

-दिसंबर, 2019 में नागरिकता संशोधन क़ानून (सीएए) बनने के बाद देशभर में इसके ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन होने लगे। दिल्ली में भी कई जगहों पर सीएए के विरोध में प्रदर्शन होने लगे।

-दिल्ली विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी के कई नेताओं ने सीएए विरोधियों के ख़िलाफ़ हिंसा भड़काने के लिए भाषण दिए। ऐसे कई भाषणों को इस रिपोर्ट का हिस्सा बनाया गया है।

-हिंदू दक्षिणपंथी गुटों के ज़रिए सीएए के विरोध में प्रदर्शन कर रहे लोगों को डराने धमकाने के लिए उनपर हमले किए गए। 30 जनवरी को जामिया मिल्लिया इस्लामिया में प्रदर्शनकारियों पर रामभक्त गोपाल ने गोली चलाई और एक फ़रवरी को कपिल गुर्जर ने शाहीन बाग़ में प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई।

-23 फ़रवरी को बीजेपी नेता कपिल मिश्रा के मौजपुर में दिए गए भाषण के फ़ौरन बाद दंगे भड़क गए। इस भाषण में कपिल मिश्रा ने जाफ़राबाद में सीएए के विरोध में बैठे प्रदर्शनकारियों को बलपूर्वक हटाने की बात की थी और दिल्ली पुलिस के डीसीपी वेद प्रकाश सूर्या की मौजूदगी में कपिल मिश्रा ने ये भडकाऊ भाषण दिया था।

-हथियारबंद भीड़ ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली के कई इलाक़ों में लोगों पर हमले किए, उनके घरों और दुकानों को आग लगा दी। इस दौरान भीड़ जय श्रीरामहर-हर मोदीकाट दो इन। । । । । । । । । । को और आज तुम्हें आज़ादी देंगे जैसे नारे लगा रही थी।

-मुसलमानों की दुकानों को चुन-चुन कर निशाना बनाया गया जिसमें स्थानीय युवक भी थे और कुछ लोग बाहर से लाए गए थे। अगर दुकान के मालिक हिंदू हैं और मुसलमान ने किराए पर दुकान ले रखी थी तो उस दुकान को आग नहीं लगाई गई थी, लेकिन दुकान के अंदर का सामान लूट लिया गया था।

-पीड़ितों से बातचीत के बाद लगता है कि ये दंगे अपने आप नहीं भड़के बल्कि ये पूरी तरह सुनियोजित और संगठित थे और लोगों को चुन-चुन कर निशाना बनाया गया था।

-रिपोर्ट के अनुसार 11 मस्जिद, पाँच मदरसे, एक दरगाह और एक क़ब्रिस्तान को नुक़सान पहुँचाया गया। मुस्लिम बहुल इलाक़ों में किसी भी ग़ैर-मुस्लिम धर्म-स्थल को नुक़सान नहीं पहुँचाया गया था।

-इन दंगों में दिल्ली पुलिस की भूमिका बहुत ख़राब थी। कई जगहों पर वो तमाशाई बने रहे या फिर दंगाइयों को शह देते रहे। चश्मदीदों के अनुसार अगर किसी एक जगह एक पुलिस वाले ने दंगाइयों को रोकने की कोशिश भी की तो उसके साथी पुलिसवाले ने उसे ही रोक दिया। पीड़ितों के अनुसार पुलिस ने कई मामलों में एफ़आईआर लिखने से मना कर दिया और कई बार संदिग्ध का नाम हटाने के बाद एफ़आईआर लिखी।

-कई जगहों पर पुलिसवालों ने दंगाइयों को हमले के बाद ख़ुद सुरक्षित निकाल कर ले गए और कई जगह तो कुछ पुलिस वाले ख़ुद हमले में शामिल थे।

-महिला पीड़ितों के अनुसार कई जगहों पर उनके नक़ाब और हिजाब उतारे गए।

-दंगाई और पुलिस वालों ने धरने पर बैठी महिलाओं को निशाना बनाया और इसमें कई पुरुष पुलिसकर्मी ने महिलाओं के साथ बदतमीज़ी की।

-उनको रेप करने और एसिड हमले करने की धमकी दी गई।

-कमेटी ने मुआवज़े के लिए लिखे गए 700 आवेदनों का अध्ययन किया। कमेटी ने पाया कि ज़्यादातर मामलों में क्षतिग्रस्त जगह का दौरा भी नहीं किया गया है और जिन मामलों में सही पाया गया है उनमें भी सिर्फ़ बहुत कम अंतरिम सहायता राशि दी गई है। दंगों के फ़ौरन बाद कई लोग घर छोड़ कर चले गए हैं, इसलिए वो मुआवज़े के लिए अपील भी नहीं कर सके हैं। मुआवज़े में भी सरकारी अधिकारी के मरने पर उनके परिवार वालों को एक करोड़ की रक़म दी गई जबकि आम नागरिकों की मौत पर केवल 10 लाख रुपए का मुआवज़ा दिया गया।

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के वकील एमआर शमशाद कमेटी के चेयरमैन थे जबकि गुरमिंदर सिंह मथारू, तहमीना अरोड़ा, तनवीर क़ाज़ी, प्रोफ़ेसर हसीना हाशिया, अबु बकर सब्बाक़, सलीम बेग, देविका प्रसाद और अदिति दत्ता कमेटी के सदस्य थे।

बीबीसी इनपुट के साथ

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