Monday, June 14, 2021

 

 

 

शत्रु घोषित कर मुसलमानों की 16 हज़ार प्रॉपर्टीयों पर कब्ज़ा जमाना चाहती हैं मोदी सरकार

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1947 में देश की आजादी के साथ ही मुल्क का बंटवारा हो गया था. जिसका सबसे ज्यादा नुकसान देश के मुसलमानों को उठाना पड़ा. और आज भी उठा ही रहा हैं. इसके बावजूद अब केंद्र की मोदी सरकार की नजर देश में मुसलमानों की 16 हज़ार प्रॉपर्टीयों पर हैं.

आज़ादी का बाद 1950 में बंटवारें से जुड़े लोगों की संपत्ति के अधिग्रहण के लिए ‘विस्थापित व्यक्ति संपत्ति अधिनियम’ बनाया गया था. ये अधिनियम बाद कुछ और प्रावधानों के साथ ‘शत्रु संपत्ति अधिनियम’ में परिवर्तित कर दिया गया. इस अधिनियम के तहत जो लोग भारत छोड़ कर पाकिस्तान चले गए थे उन्हें शत्रु मानकर उनकी संपत्ति को भारत सरकार ने अधिग्रहित कर लिया था.

लेकिन मामला उस वक्त उलझ गया जब भारत सरकार ने उन लोगों के वारिसों की सम्पति को भी अधिग्रहित किया जिनके वारिस भारत के ही नागरिक हैं और आज़ादी से पहले से ही भारत में रह रहे हैं. उनके पूर्वज या रिश्तेदार पाकिस्तान चले गये लेकिन उन्होंने भारत में रहना मंजूर किया. इस तरह के कई विवाद न्यायालय में पहुंचे जिनकी सम्पति की कीमत करोड़ो में हैं. ये मुकदमें अभी भी न्यायालय में लंबित हैं.

उदहारण के लिए भोपल के नवाब की संपत्ति जो पटौदी परिवार के अधीन है उसका मुकदमा अभी भी जबलपुर उच्च न्यायलय में लंबित है. ऐसा ही एक बड़ा मुकदमा महमूदाबाद के राजा एम ए एम खान का है, जिनकी लखनऊ, सीतापुर और लखीमपुर में 936 संपत्तियां हैं.

हालाँकि, सर्वोच्च न्यायालय ‘यूनियन ऑफ़ इंडिया बनाम राजा एमएएम खान’ मामलें में अक्तूबर 21, 2005 को निर्णय दे चूका हैं कि दुश्मन की मौत के बाद संपत्ति को शत्रु संपत्ति नहीं कहा जा सकता और यह सम्पति कानूनन उतराधिकारी को उत्तराधिकार में दे दी जानी चाहिए यदि उत्तराधिकारी भारत का नागरिक है.

इसके बावजूद केंद्र की मोदी सरकार एक कानून बनाकर कर इन संपत्तियों से उनके कानूनन उत्तराधिकारियों को वंचित करना चाहती है. इसे शत्रु संपत्ति अध्यादेश नाम दिया गया हैं. इसे अब तक लोकसभा में पारित किया जा चूका हैं. परन्तु राज्यसभा में विपक्ष के विरोध के कारण अब तक पास नहीं कराया जा सका.

इस अध्यादेश को माननीय राष्ट्रपति के पास हस्ताक्षर करने के लिए पांच भेजा जा चूका हैं. माननीय राष्ट्रपति इस अध्यादेश पर अपनी कड़ी आपति भी जाहिर कर चुके हैं. हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा था कि किसी भी अध्यादेश की पुनरावृत्ति, चाहे वह दूसरी बार ही क्यों न हो, संविधान के साथ एक धोखा है.

अब ऐसे में कहा जा सकता हैं कि मोदी सरकार देश के नागरिकों को देशद्रोही घोषित कर उनकी सम्पति जब्त करने पर तुली हैं.

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