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ट्रिपल तलाक के खिलाफ इलाहबाद हाईकोर्ट द्वारा की गई टिप्पणी को दारुल उलूम देवबंद ने मुस्लिम पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप करार दिया हैं.

दारुल उलूम देवबंद के वाइस चांसलर मुफ्ती अबू कासिम नोमानी ने इस बारें में कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत देश के सभी धर्मों के लोगों को अपने धर्म का पालन करने की आज़ादी और उसके प्रचार की समान अधिकार दिए गए हैं. ऐसे में न्यायपालिका को मुस्लिम पर्सनल लॉ में दखल नहीं देना चाहिए.

मुफ्ती अबू कासिम नोमानी ने आगे कहा कि इस्लाम में तलाक दिए जाने को अच्छा नहीं माना गया है, फिर चाहे यह एक तलाक हो या दो तलाक या तीन तलाक इसे शरीयत ने ठीक नहीं माना है लेकिन जीवन साथी के बीच झगड़ा होने और मजबूरी की स्थिति पैदा हो जाने पर तलाक दी जाती है. उन्होंने कहा कि पुरुषों की तरह महिलाओं को भी पति से अलग होने का अधिकार ‘खुला’ प्राप्त है.

मुफ्ती नोमानी ने सवाल उठाते हुए कहा कि जब तीन तलाक का मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं तो निचली अदालतों को मुस्लिम पर्सनल लॉ के साथ छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए. उन्होंने कहा कि जब धर्म के अधिकार को संविधान का संरक्षण प्राप्त है तो तलाक देने को संवैधानिक उल्लंघन कैसे माना जा सकता है.

मुफ्ती नोमानी ने कहा कि इस्लाम में महिलाओं को जितने अधिकार दिए गए हैं उतने किसी अन्य धर्म में नहीं दिए गए हैं. उन्होंने यह भी कहा कि मुसलमानों में तलाक के मामले दूसरे धर्मों के मानने वालों से बहुत कम होते हैं.


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