Friday, July 30, 2021

 

 

 

शहीद जवान की विधवा की मोदी सरकार से गुहार – दोनों देशों के बीच युद्ध नहीं बल्कि हो बातचीत

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पुलवामा हमले में सीआरपीएफ के शहीद जवान बबलू संत्रा की पत्नी मीता संत्रा ने गुरुवार को भारत और पाकिस्तान से आग्रह किया कि दोनों देश तनाव बढ़ाने के बजाय वार्ता करें। हालांकि इसके बाद उन्हें कई वेबसाइट और सोशल मीडिया में ट्रोल किया गया। उन्हे लोगों ने गाली देते हुए कायर और खुदगर्ज कहा गया।  बता दें कि 14 फरवरी को सीआरपीएफ के काफिले पर हुए आत्मघाती हमले में 40 जवान शहीद हो गए थे। शहीदों में मीता के पति बबलू भी शामिल थे। मीता अपने युद्ध विरोधी रूख की सोशल मीडिया पर आलोचना को लेकर भी चिंतित नहीं है।

मीता ने कहा, ‘हमें कई जान लेने वाले युद्ध के बजाय वार्ता का मौका देना चाहिए।’ साथ ही उन्होंने भारत सरकार से अभिनंदन की वापसी के लिए सभी प्रयास करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा, ‘मैं अपनी सरकार से पाकिस्तान को घेरकर विंग कमांडर अभिनंदन वर्तमान की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित करने का अनुरोध करती हूं।’

मीता सांतरा ने टाइम्स ऑफ इंडिया से बात करते हुए कहा कि मैं अभी सोशल मीडिया देखने की हालत में नहीं हूं। लेकिन मैं जो कहा था मैं उस पर अभी भी कायम हूं। लोगों के अपने विचार होते हैं। यहां किसी को अपनी बात रखने की स्वतंत्रता(फ्रीडम ऑफ स्पीच) का अधिकार है। मैं उनसे अलग नहीं हूं।

वो युद्ध के खिलाफ क्यों है इस पर मीता ने कहा कि युद्ध के मैदान में हर मौत आखिरकार सैनिकों के परिवारों को तबाह कर देती है। एक शिक्षक और इतिहास के एक छात्र के रूप में, मुझे पता है कि युद्ध कोई स्थायी समाधान है। इसमें एक पत्नी अपने पति को खो देती है, एक माँ अपने बेटे को खो देती है और एक बेटी अपने पिता को खो देती है। उसने आगे लिखा कि मैंने इन नुकसानों के बारे में पढ़ा और अनुभव किया है। इसका नुकसान सिर्फ एक व्यक्ति को नहीं बल्कि पूरे देश को उठाना पड़ता है। एक लड़ाई हमारी अर्थव्यवस्था और सामाजिक विकास को बुरी तरह प्रभावित करती है।

उन्होने कहा, कुछ लोगों ने मेरे बयान को गलत तरीके से लिया और मेरे युद्ध विरोधी बयान को कायरता कहा है। मैं हमारे वायुसेना,आर्मी और नेवी के बहादुर जवानों का समर्थन करती हूं, जो उन्होंने मंगलवार को किया वो काबिलेतारीफ है।

मीता सांतारा ने अपनी बात दोहराते हुए कहा कि 14 फरवरी को सीआरपीएफ के काफिले की पूरी तरह सुरक्षा के इंतजाम नहीं किए गए थे। खुफिया एजेंसियों ने हमले की चेतावनी दी थी। लेकिन इसके बावजूद एहतियाती कदम नहीं उठाए गए थे। अगर काफिले में जैमर होते तो हमले को रोका जा सकता था। मेरे ख्याल से इसमें बहुत असफलताएं और इंटरकम्यूनिकेशन की कमी थी।

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