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देश में गरीब बेहतर इलाज के अभाव में काल में समा रहा है. वहीँ दूसरी और मीडियल कंपनिया और वितरक लुटमार में लगे हुए है. एक तरह से देखा जाए तो मेडिकल लॉबी ने देश को बंधक बनाया हुआ है.

राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) की जांच में सामने आया कि सिरिंज और सुइयां को 1,250 प्रतिशत तक के मुनाफे के साथ बेचा जा रहा है. ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि मीडियल कंपनिया और वितरक दवाइयों पर कितना लुट रहे होंगे.

एनपीपीए के अनुसार, सुई के साथ 5 एमएल की हाइपोडर्मिक डिस्पोजेबल सिरिंज वितरकों को औसतन 2.31 रुपये में दी जाती हैं. इन्हें 13.08 रुपये के अधिकमत खुदरा मूल्य पर बेचा जा रहा है. औसत मुनाफा जहां 636 प्रतिशत बैठता है तो कई जगह इसमें अधिकतम मुनाफा 1,251 प्रतिशत तक कमाया जा रहा है.

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वहीं, सुई के बिना 50 एमएल की हाइपोडर्मिक डिस्पोजेबल सिरिंज को अधिकतम 1,249 प्रतिशत मुनाफे के साथ बेचा जा रहा है. वितरकों को इसकी लागत 16.96 रुपये पड़ती है और आगे इसे 97 रुपये के खुदरा मूल्य पर बेचा जाता है. जहां इस पर औसत मुनाफा 214 से 664 प्रतिशत बैठता है तो अधिकतम मुनाफा कई जगहों पर 1249 प्रतिशत तक कमाया जाता है.

नियामक ने कहा कि एक एमएल की सुई के साथ इन्सुलिन सिरिंज को 400 प्रतिशत के मुनाफे पर बेचा जा रहा है. वहीं, बिना सुई वाली इस सिरिंज पर 287 प्रतिशत मुनाफा कमाया जा रहा है.

एनपीपीए ने कहा कि डिस्पोजेबल हाइपोडर्मिक सुई का वितरकों को औसत मूल्य 1.48 रुपये बैठता है और इसे 4.33 रुपये के अधिकतम खुदरा मूल्य पर बेचा जाता है. जहां इसका औसत मुनाफा 270 प्रतिशत बैठता है. वहीं, अधिकतम 789 प्रतिशत तक के ऊंचे मुनाफे पर इसे बेचा जाता है.

एपिड्यूरल सुई का वितरकों को औसत मूल्य 160 रुपये बैठता है. इसे 730 रुपये के अधिकतम खुदरा मूल्य पर बेचा जा रहा है. यानी इसमें 356 प्रतिशत का लाभ अर्जित किया जा रहा है.

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