जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) से अक्टूबर 2016 में लापता हुए छात्र नजीब अहमद के बारे में केंद्रीय जांच एजेंसी (सीबीआई) दो सालों मे भी कुछ भी पता नहीं लगा पाई है।

सीबीआई के अधिवक्ता ने न्यायमूर्ति एस. मुरलीधर और न्यायमूर्ति आई.एस. मेहता की खंडपीठ को बताया कि एजेंसी ने कई लोगों की भूगौलिक स्थिति का पता लगाने के लिए डिजिटल फुटप्रिंटिंग तकनीक का सहारा लिया लेकिन इससे भी इस मामले में कोई फायदा नहीं मिला।

बता दें कि नजीब 15 अक्टूबर 2016 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के सदस्यों द्वारा कैम्पस मे कि गई कथित मारपीट के बाद से ही लापता है।

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इस बारें में सीबीआई ने कहा कि अब तक ऐसा कोई सुबूत नहीं मिला है, जिससे यह माना जा सके कि कोई अपराध हुआ है। यहां तक कि संदिग्ध नौ छात्रों के खिलाफ भी कोई साक्ष्य सामने नहीं आया है, जिसके आधार पर उन्हें गिरफ्तार किया जा सके। इसलिए क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करने पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है।

सीबीआई ने अदालत को बताया कि हैदराबाद स्थित फोरेंसिक प्रयोगशाला तीन फोन का निरीक्षण नहीं कर सकी क्योंकि उनमें से दो फोन टूट चुके थे तथा तीसरे का पैटर्न लॉक खुल नहीं सका। सुनवाई के दौरान नजीब की मां फातिमा नफीस के वकील कॉनिल गोन्साल्वे ने कहा कि पैटर्न लॉक किसी भी सामान्य मोबाइल रिपेयरिंग दुकान पर 50 रुपये देकर खुलवाया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि यह स्वीकार ही नहीं किया जा सकता कि लोग चांद पर पहुंच सकते हैं लेकिन एक मोबाइल फोन का लॉक नहीं तोड़ सकते। गोन्साल्वे ने अदालत में कहा कि एफआईआर में 18 संदिग्ध छात्रों का नाम हैं, लेकिन जांच एजेंसी ने अब तक उन्हें हिरासत में लेकर पूछताछ नहीं की।

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