लोकसभा में गृह मंत्री अमित शाह ने सोमवार को नागरिकता संशोधन विधेयक पेश किया। विधेयक को पेश किए जाने के लिए विपक्ष की मांग पर मतदान करवाया गया और सदन ने 82 के मुकाबले 293 मतों से इस विधेयक को पेश करने की स्वीकृति दे दी।

कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस सहित विपक्षी सदस्यों ने विधेयक को संविधान के मूल भावना एवं अनुच्छेद 14 का उल्लंघन बताते हुए इसे वापस लेने की मांग की। गृह मंत्री शाह ने कहा कि विधेयक कहीं भी देश के अल्पसंख्यकों के खिलाफ नहीं है और इसमें संविधान के किसी अनुच्छेद का उल्लंघन नहीं किया गया।

शाह ने सदन में यह भी कहा ‘अगर कांग्रेस पार्टी देश की आजादी के समय धर्म के आधार पर देश का विभाजन नहीं करती तो इस विधेयक की जरूरत नहीं पड़ती।’ नागरिकता अधिनियम, 1955 का एक और संशोधन करने वाले विधेयक को संसद की मंजूरी मिलने के बाद पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से शरणार्थी के तौर पर आए उन गैर-मुसलमानों को भारत की नागरिकता मिल जाएगी जिन्हें धार्मिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ा हो।

शाह ने जब विधेयक पेश करने के लिए सदन की अनुमति मांगी तो कांग्रेस के अधीर रंजन चौधरी ने विधेयक पेश किये जाने का विरोध करते हुए कहा कि यह अल्पसंख्यकों को लक्ष्य कर लाया गया विधेयक है। इस पर गृह मंत्री ने कहा, ‘विधेयक देश के अल्पसंख्यकों के 0.001 प्रतिशत भी खिलाफ नहीं है।’

उन्होंने चौधरी की टिप्पणियों पर कहा कि विधेयक के गुण-दोषों पर इसे पेश किये जाने से पहले चर्चा नहीं हो सकती। सदन की नियमावली के तहत किसी भी विधेयक का विरोध इस आधार पर हो सकता है कि क्या सदन के पास उस पर विचार करने की विधायी क्षमता है कि नहीं। शाह ने कहा ‘‘ विधेयक पर चर्चा के बाद मैं सदस्यों की हर चिंता का जवाब दूंगा।’’

द्रमुक के टी आर बालू ने श्रीलंकाई तमिलों के विषय को उठाया. इसके बाद पार्टी के सदस्यों ने सदन से वाकआउट किया। आईयूएमएल के पी के कुन्हालीकुट्टी और ई टी मोहम्मद बशीर, कांग्रेस के शशि थरूर और एआईएमआइएम के असदुद्दीन ओवैसी ने भी विधेयक को संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करने वाला बताते हुए और इसे पेश किये जाने का विरोध किया।

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