रायपुर. छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले के सारकेगुड़ा में जून 2012 में हुई कथित पुलिस-नक्सली मुठभेड़ फर्जी पाई गई। बता दें सुरक्षाबलों के जवानों के साथ हुई मुठभेड़ में 17 स्थानीय लोग मा’रे गए थे।

इस मुठभेड़ की जांच के लिए जांच आयोग का गठन किया गया था। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। 78 पन्नों की इस रिपोर्ट में मुठभेड़ में शामिल सीआरपीएफ और सुरक्षाबल के अन्य जवानों को कठघरे में खड़ा किया गया है।

एक सदस्यीय न्यायिक आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि गांव वालों को प्रताड़ित किया गया और बाद में उन्हें काफी करीब से गोली मारी गई। रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसा लगता है कि सुरक्षाबलों ने हड़बड़ाहट में फायरिंग की। रात में कई घंटों की कथित मुठभेड़ के बाद इनमें से हिरासत में लिए एक ग्रामीण को अगली सुबह गोली मा’री गई।

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इस रिपोर्ट में कहा गया कि मुठभेड़ के दौरान जो छह सुरक्षाकर्मी घा’यल हुए हैं, वे शायद साथी सुरक्षाकर्मियों द्वारा की गई क्रॉस फायरिंग में घाय’ल हुए हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जांच में जानबूझकर गड़बड़ी की गई। हालांकि, ग्रामीणों का यह दावा कि वे त्योहार के बारे में चर्चा करने के लिए इकट्ठा हुए थे, यह भी अत्यधिक संदेहास्पद है।

बता दें कि 28 जून, 2012 की रात को सीआरपीएफ और छत्तीसगढ़ पुलिस की टीम को सिलगर में माओवादियों के होने की सूचना मिली थी। जिस पर सुरक्षाबलों ने माओवादियों की गिरफ्तारी के लिए ऑपरेशन चलाया। इनमें से दो टीम बासेगुडा से चलकर सारकेगुडा पहुंची। गांव से 3 किलोमीटर दूर गांववाले एक मीटिंग कर रहे थे।

रिपोर्ट में कहा गया कि गांव वालों ने फायरिंग की, जिस पर सुरक्षाबलों ने जवाबी कार्रवाई करते हुए फायरिंग की। वहीं गांववालों का कहना है कि वह ‘बीज पंडुम’ त्योहार पर चर्चा करने के लिए इकट्ठा हुए थे। इसी दौरान सुरक्षाबलों ने उन्हें घेरकर फायरिंग कर दी, जिसमें 17 लोगों की जान चली गई।

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