firangi mahali

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने गुरुवार को ‘मस्जिद इस्लाम का अभिन्न अंग है या नहीं’ के बारे में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कहा कि इस निर्णय से यह साफ हो गया है कि अयोध्या मामले की सुनवाई आस्था की बुनियाद पर बिल्कुल नहीं होगी।

बोर्ड कार्यकारिणी के वरिष्ठ सदस्य मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली ने कहा कि इस फैसले से दो बेहद सकारात्मक बातें निकलकर आई हैं। पहला, यह कि अयोध्या मामले की सुनवाई कतई तौर पर आस्था की बुनियाद पर नहीं होगी, बल्कि केवल स्वामित्व के विवाद के तौर पर होगी। दूसरा, इस्माइल फारूकी की अदालत का जो भी नजरिया था, उसका कोई भी असर अयोध्या मामले पर नहीं पड़ेगा।

उन्होने ये भी कहा कि अदालत के फैसले का हम सब सम्मान करते हैं। हालांकि हम चाहते थे कि इस्माइल फारूकी वाले मामले को संवैधानिक पीठ के सामने रखा जाए, ताकि मसला हमेशा के लिए हल हो जाए। मौलाना ने कहा कि अब 29 अक्तूबर से अयोध्या मामले की सुनवाई का एलान किया गया है, उससे उम्मीद जगी है कि मामले की अंतिम सुनवाई जल्द से जल्द हो जाएगी।

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उन्होंने एक सवाल पर कहा कि इस मामले में जहां तक मजहबी नजरिए का सवाल है तो मस्जिद का बुनियादी मकसद ही नमाज अदा करने का होता है। मस्जिद का होना जरूरी है। यह बात कुरान, हदीस और इस्लामी कानून से पूरी तरह साबित है। उन्होने ये भी कहा कि अयोध्या मामले की सुनवाई को आगामी लोकसभा चुनाव से जोड़कर देखना मुनासिब नहीं होगा।

बोर्ड के एक अन्य वरिष्ठ सदस्य और उत्तर प्रदेश के पूर्व अपर महाधिवक्ता जफरयाब जीलानी ने कहा कि यह फैसला सिर्फ तकनीकी मसले से जुड़ा है। इसे अयोध्या के मामले से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने 1994 के फैसले को फिर से विचार के लिए पांच सदस्यीय संविधान पीठ के पास भेजने से आज इनकार कर दिया।सुप्रीम कोर्ट ने मस्जिद को इस्लाम का अटूट हिस्सा मानने से इंकार कर दिया।

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