नई दिल्ली | एनडीटीवी छोड़ने के बाद मशहूर पत्रकार बरखा दत्त ने अमेरिका के वाशिंगटन पोस्ट में एक लेख लिखा. इस लेख के जरिये बरखा दत्त ने मोदी सरकार के नोट बंदी के निर्णय की आलोचना करते हुए कहा की इससे देश 1971 के दौर में चला गया. बरखा दत्त ने नोट बंदी की वजह से मारे गए लोगो के लिए सरकार की गलत योजना और सम्पर्क व्यवस्था को जिम्मेदार ठहराया.

एनडीटीवी की पूर्व पत्रकार बरखा दत्त हमेशा से सरकार की गलत नीतियों की आलोचना करने के लिए मशहूर रही. नोट बंदी से लेकर कश्मीर में पेलेट गन के इस्तेमाल पर उन्होंने सरकार की आलोचना की. इसकी वजह से उन्हें सोशल मीडिया पर काफी ट्रोल भी किया गया. अब चूँकि बरखा दत्त एनडीटीवी छोड़ चुकी है इसलिए उन्होंने अपने विचार को रखने के लिए वाशिंगटन पोस्ट का सहारा लिया.

उन्होंने अपने लेख में बताया की भारत एक ऐसा देश है जहाँ 90 फीसदी ट्रांसेक्सन नकद में होता है. लेकिन हमारे प्रधानमंत्री ने केवल चार घंटे पहले 500 और 1000 के नोट बंद करने का आदेश दे दिया. उन्होंने कालाधन समाप्त करने और नकली नोटों को प्रचालन से बाहर करना इसका मकसद बताया. हमें नही पता की मोदी जी जो मकसद बताया था वो नोट बंदी से हासिल हुआ या नही लेकिन सरकार की ख़राब योजना और संपर्क की वजह से लोगो को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा.

बरखा ने आगे लिखा की सरकार की गलत नीतियों की वजह से लोगो को लम्बी लम्बी कतारों में लगना पड़ा. बरखा ने कहा की हमें सिंगापूर के पूर्व प्रधानमंत्री ली कुआन जैसे शख्स की जरुरत है. बरखा ने नोट बंदी के फैसले की तुलना इंदिरा गाँधी के 1969 में बैंकों के राष्ट्रीयकरण करने के फैसले के साथ की. उन्होंने कहा की मोदी का यह फैसला केंद्र की ताकत को याद दिलाता है. ऐसी ही ताकत देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने 1969 में बैंकों का राष्ट्रीयकरण करके दिखाई थी.

नोट बंदी के बाद मोदी ने देश से 50 दिन मांगे थे. मोदी की उस अपील का जिक्र करते हुए बरखा दत्त ने लिखा की मोदी जी ने 50 दिन मांगे थे लेकिन 2 महीने हो चुके है. अभी भी लोगो की परेशानी कम नही हुई है. ऐसे में हमें उनसे पूछना चाहिए की आखिर इस फैसले से हमें क्या मिला. कालाधन बाहर लाने की दुहाई दे रहे थे लेकिन केवल 6 फीसदी ही कालाधन बाहर आ सका. इसके अलावा बंद किये गए पुरे नोट भी बैंकिंग सिस्टम में वापिस आ गए.


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