नई दिल्ली | मोदी सरकार ने 8 नवम्बर 2016 को सभी 500 और 1000 के नोट बंद करने के एलान के साथ घोषणा की थी की 30 दिसम्बर 2016 सभी भारतीय बैंकों में जाकर पुराने नोट बदल सकते है. इसके अलावा पीएम मोदी ने यह भी घोषणा की थी की वो लोग जो किसी कारण से 30 दिसम्बर तक पुराने नोट बैंक में जमा नही करा सके वो 31 मार्च 2017 तक रिज़र्व बैंक की किसी भी शाखा में पुराने नोट जमा कर नए नोट हासिल कर सकते है.

लेकिन नोट बंदी की घोषणा के बाद रिज़र्व बैंक और वित्त मंत्रालय की और से न जाने कितनी बार नियम बदले गए. एक ऐसे ही नियम में कहा गया की केवल एनआरआई ही 30 दिसम्बर के बाद रिज़र्व बैंक में पुराने नोट जमा कराने के पात्र है. लेकिन 30 दिसम्बर के बाद भी ऐसे बहुत सारे भारतीय सामने आये जो बैंकों में पुराने नोट जमा नही करा सके. सब लोगो ने इसके लिए वाजिब कारण भी रिज़र्व बैंक के सामने रखे.

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लेकिन न ही सरकार और न ही रिज़र्व बैंक ने इन लोगो की कोई सुध ली. इसलिए लोगो को सुप्रीम कोर्ट का रुख करना पड़ा. फ़िलहाल सुप्रीम कोर्ट इस मामले में सुनवाई कर रहा है. उम्मीद है की जुलाई में कोर्ट इस बात का फैसला ले सकता है की पुराने नोट बदलने का एक मौका दिया जाना चाहिए या नही. हालाँकि केंद्र सरकार की और से सरकार का पक्ष रखते हुए अटोर्नी जनरल ने कहा की अध्यादेश में इस तरह की कोई बाध्यता नही है.

अटोर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने बताया की अध्यादेश में कहा गया है की चलन से बाहर हो चुके नोटों को रखना अपराध माना जायेगा. इसलिए पुराने नोट जमा करने का दूसरा मौका नही दिया जाएगा. जस्टिस जे एस खेहर, जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस संजय किशन कौल की खंडपीठ ने सुनवाई करते हुए कहा की हम केवल इस बात का फैसला लेंगे की लोगो को पुराने नोट जमा करने का एक मौका देना चाहिए या नही.

हालाँकि मुकुल रोहतगी ने कहा की अगर सुप्रीम कोर्ट लोगो को पुराने नोट जमा करने का एक मौका देती है तो केंद्र सरकार के पास यह अधिकार रहेगा की वो यह तय करे की पुराने नोट जमा नही करने का किसका कारण वाजिब है और किसका नही. इसलिए उम्मीद है की जुलाई में सुप्रीम कोर्ट पुराने नोट दोबारा जमा करने का एक और मौका दे दे.

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