Saturday, October 23, 2021

 

 

 

बाबरी मस्जिद केस: मोदी सरकार ने की SC से गैर-विवादित जमीन को लौटाने की मांग

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नई दिल्ली. मोदी सरकार ने अयोध्या मामले में मंगलवार को एक बड़ा कदम उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दायर कर मांग की कि अयोध्या की गैर-विवादित जमीनें उनके मूल मालिकों को लौटाने की मांग की है।

केंद्र सरकार की ओर से दाखिल की गई अर्जी में मांग की गई है कि 67 एकड़ जमीन का सरकार ने अधिग्रहण किया था जिसपर सुप्रीम कोर्ट ने यथास्थिति बरकरार रखने का आदेश दिया था। जमीन का विवाद सिर्फ 0.313 एक़ड़ का है बल्कि बाकी जमीन पर कोई विवाद नहीं है। इसलिए उस पर यथास्थिति बरकरार रखने की जरूरत नहीं है।

केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट के 1994 के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि इस्माईल फारुकी केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर केंद्र चाहे तो सेंट्रल एरियाज ऑफ अयोध्या एक्ट के तहत मूल विवाद के 0.313 एकड़ इलाके के अलावा अतिरिक्त अधिग्रहित जमीनें उनके मूल मालिकों को लौटा सकता है।

केंद्र ने अपनी याचिका में कहा है कि अधिग्रहित जमीनें उनके मूल मालिकों को लौटाने की मांग राम जन्मभूमि न्यास की है। न्यास ने अपनी 42 एकड़ जमीन मांगी है। सरकार को एक प्लान मैप बनाकर न्यास और अन्य मूल भूमि मालिकों को उनकी जमीन लौटा देने में सैद्धांतिक रूप से कोई आपत्ति नहीं है, बशर्ते विवादित स्थल तक उचित पहुंच बनी रहे।

babri masjid

गौरतलब है कि अयोध्या मामले की नई संवैधानिक 5 सदस्यीय संवैधानिक पीठ सुनवाई कर रही है। न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस ए नजीर इसमें शामिल हैं। ये दोनों राजनीतिक रूप से संवेदनशील राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद मामले पर सुनवाई के लिये पूर्व में गठित तीन सदस्यीय पीठ का हिस्सा थे।

न्यायमूर्ति भूषण और न्यायमूर्ति नजीर तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा (अब सेवानिवृत्त) की अध्यक्षता वाली उस तीन सदस्यीय पीठ का हिस्सा थे, जिसने 27 सितंबर 2018 को 2:1 के बहुमत से शीर्ष अदालत के 1994 के एक फैसले में की गई एक टिप्पणी को पांच सदस्यीय संविधान पीठ के पास पुनर्विचार के लिये भेजने से मना कर दिया था।

इससे पहले 10 जनवरी को 5 जजों की संवैधानिक बेंच ने इस मामले पर सुनवाई शुरू की थी, लेकिन कोर्ट में सुनवाई शुरू होते ही सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील राजीव धवन ने पांच जजों की बेंच में जस्टिस यूयू ललित की मौजूदगी पर सवाल उठाए। इसके बाद जस्टिस ललित खुद ही बेंच से अलग हो गए। क्योंकि वह 1997 में एक संबंधित मामले में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की तरफ से एक वकील के तौर पर पेश हुए थे।

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