कलकत्ता हाईकोर्ट के जज जस्टिस सीएस करनन ने सुप्रीम कोर्ट को दलित विरोधी बताया हैं. उन्होंने कहा कि अदालत का झुकाव सवर्णों की ओर है. उन्होंने ये बातें सुप्रीम कोर्ट से अवमानना नोटिस जारी होने के बाद कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को लिखे ख़त में कही हैं.

सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को लिखे पत्र में उन्होंने कहा कि ऊंची जाति के जज अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के जज से मुक्ति चाहते हैं. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि वह इस मामले को संसद को रिफर कर दे. उनका कहना है कि वहां यह मामला कतई नहीं टिकेगा.

उन्होंने कहा कि एक दलित जज को अवमानना नोटिस जारी करना अनैतिक है और अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम के खिलाफ है. स्टिस करनन ने यह भी कहा कि ‘संविधान पीठ को हाईकोर्ट के कार्यरत जज के खिलाफ स्वत: संज्ञान लेते हुए अवमानना नोटिस जारी नहीं कर सकती. मेरा पक्ष सुने बिना मेरे खिलाफ ऐसा आदेश कैसे जारी किया जा सकता है. इससे जाहिर होता है कि पीठ मुझसे द्वेष भावना रखती है.

जस्टिस करनन ने कहा कि मेरा स्पष्टीकरण लेने से पहले मैं अदालत को बता देना चाहता हूं कि अदालत के पास वह शक्ति नहीं है जो कोलकत्ता हाईकोर्ट के एक मौजूदा जज के खिलाफ सजा सुना सके. उन्होंने कहा कि यह आदेश अतार्किक है. उन्होंने कहा, अवमानना नोटिस जारी करने से मेरी समानता और प्रतिष्ठा का अधिकार प्रभावित हुआ है और साथ ही यह प्रिंसिपल ऑफ नेचुरल जस्टिस के भी खिलाफ है.

मालूम हो कि जस्टिस करनन पर आरोप है कि उन्होंने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के कुछ जजों पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था. साथ ही उन्होंने 20 जजों के नामों की सूची भी दी थी.इस मामले में गत आठ अक्तूबर को जस्टिस जेएस खेहर सहित सुप्रीम कोर्ट के सात वरिष्ठ जजों की पीठ ने स्वत: संज्ञान लेते हुए जस्टिस करनन को अवमानना नोटिस जारी करते हुए 13 फरवरी को व्यक्तिगत रूप से पेश होने के लिए कहा था. साथ ही संविधान पीठ ने जस्टिस करनन को न्यायिक और प्रशासनिक कामों से दूर रहने के लिए कहा था,


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