संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) को लेकर सड़क से लेकर संसद तक में घिरी मोदी सरकार की और से इस कानून का बचाव करने के लिए खुद केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह आए है। लेकिन अपने उलूल-जुलूल बयानों से वह सरकार की मुसीबत ही बढ़ा रहे है।

ताजा मामला कर्नाटक के हुबली में दिये गए उनके एक बयान से जुड़ा है। जिसमे उन्होने कहा था कि अल्पसंख्यकों को पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में चुनाव लड़ने का अधिकार नहीं है। लेकिन ये बयान हकीकत के उलट है। बीबीसी ने अपनी फेक्ट फाइंडिंग में दावा किया कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में अल्पसंख्यक चुनाव लड़ सकते हैं। इतना ही नहीं उनके लिए सीटें भी आरक्षित हैं।

पाकिस्तान की संसद के निचले सदन नेशनल असेंबली में 10 सीटें अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित हैं। आरक्षित सीटों के अलावा पाकिस्तान में अल्पसंख्यक किसी भी सीट पर चुनाव लड़ सकते हैं। पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 51 (2ए) अल्पसंख्यकों को यह अधिकार देता है। 2018 के चुनाव में महेश मलानी, हरीराम किश्वरीलाल और ज्ञान चंद असरानी सिंध प्रांत से संसदीय और विधानसभा की अनारक्षित सीटों से चुनाव लड़े और संसद पहुंचे।

वहीं अफगानिस्तान में भी संसद के निचले सदन के लिए एक सीट अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित है। इसके अलावा कोई भी अल्पसंख्यक किसी भी सीट से चुनाव भी लड़ सकता है लेकिन नियमों के मुताबिक उसे अपने समर्थन में पांच हजार लोगों को जुटाना होगा। वहीं अल्पसंख्यक अपने क्षेत्र के उम्मीदवार के लिए मतदान भी कर सकते हैं।

बीबीसी के मुताबिक बांग्लादेश का संविधान भी अल्पसंख्यकों को चुनाव लड़ने का अधिकार देता है। हालांकि संविधान में किसी भी अल्पसंख्यक समुदाय के लिए सीटें आरक्षित नहीं की गई है। बांग्लादेश में 50 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की गई है। मौजूदा समय में संसद में 18 उम्मीदवार अल्पसंख्यक हैं।

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