बीते दिनों उत्तराखंड के देहरादून से खबर आई थी कि आरिफ नाम के युवक ने अपना रोजा तोड़ एक अजनबी हिन्दू युवक की जान बचाई थी और अब बिहार के जहानाबाद में अमित ने इसलिए रक्तदान किया कि किसी मुस्लिम भाई को अपना रोजा न तोडना पड़े.

दरअसल, जहानाबाद में वायुसैनिक महफूज आलम की माँ कौसर जहाँ के लिए तत्काल खुन की आवश्यकता थी. ऐसे में सोशल मीडिया पर अपील की गई थी. समाजसेवी युवा अमित केप्टन तुरंत अपील पर अस्पताल पहुंचे और रक्तदान किया.

रक्तदान के बारे में जब अमित से पूछा गया कि आखिर आप ने रक्तदान में जल्दी क्यों दिखाई. जिसके जवाब में उन्होंने कहा कि रक्तदाता तो उन्हें उनके परिवार और रिश्तेदार से भी मिल जाता लेकिन उन्हें अपना रोजा तोडना पड़ता. जो मैं नहीं चाहता था. उन्होंने कहा कि देश की हिफाजत करने वाले वायुसैनिक की माँ भी हमारी माँ है और उनके खून देना मेरे लिए गौरव की बात है. वे भी हमारी हिफाजत के लिए अपना खून बहाते है.

इसी तरह मिसाल कायम करते हुए देहरादून के आरिफ ने मैक्स अस्पताल में भर्ती अजय बिजल्वाण (20 वर्ष) की जान बचाने के लिए अपना रोजा तोड़ दिया था. ए-पॉजिटिव ब्लड होने की वजह से बहुत तलाश करने के बाद भी कोई डोनर नहीं मिला. ऐसे में जब आरिफ खान को व्हाट्स एप ग्रुप के माध्यम से सूचना मिली तो उन्होंने अजय के पिता को फोन किया.

उन्होंने कहा कि वह रोजे से हैं, अगर चिकित्सकों को कोई दिक्कत नहीं है तो वह खून देने के लिए तैयार हैं. चिकित्सकों ने कहा कि खून देने से पहले कुछ खाना पड़ेगा, यानी रोजा तोड़ना पड़ेगा. आरिफ खान ने जरा भी देर नहीं की और अस्पताल पहुंच गए.

आरिफ खान ने बताया कि `अगर मेरे रोजा तोड़ने से किसी की जान बच सकती है तो मैं पहले मानवधर्म को ही निभाऊंगा. रोजे तो बाद में भी रखे जा सकता है, लेकिन जिंदगी की कोई कीमत नहीं.’

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