नई दिल्ली | नोट बंदी के करीब 10 महीने बाद आरबीआई ने इससे सम्बंधित पहले आंकड़े जारी कर दिए है. आरबीआई ने बताया की नोट बंदी के बाद करीब 99 फीसदी बंद किये गए नोट वापिस बैंकिंग प्रणाली में आ गए है. आरबीआई ने आंकड़े देते हुए बताया की नोट बंदी से करीब 15.44 लाख करोड़ रूपए के नोट चलन से बाहर हो गए थे. इनमे से 15.28 लाख करोड़ रूपए वापिस बैंकों में लौट आये.

आरबीआई ने यह भी बताया की बंद किये गए 1000 के नोट 99 फीसदी बैंकों में वापिस आ गए. नोट बंदी के समय 6.7 बिलियन 1000 के नोट चलन में थे. जिनमे से 89 मिलियन नोट ही वापिस नही लौट पाए. इसके अलावा रिज़र्व बैंक ने एक और आंकड़ा जारी किया. उन्होंने बताया की नए नोटों की छपाई की लागत पीछले साल के मुकाबले दुगनी हो गयी है. पिछले साल जहाँ यह 3,421 करोड़ रूपए थी वही इस साल यह लागत बढकर 7,965 करोड़ रूपए हो गयी.

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आरबीआई के नोट बंदी पर जारी किये गए आंकड़ो के बाद नोट बंदी की सफलता या विफलता पर बहस शुरू हो गयी है. विपक्ष ने मोदी सरकार को घेरते हुए कहा की रिज़र्व बैंक के आंकड़ो ने मोदी सरकार के सभी दावों की पोल खोल दी है. जैसा की दावा किया जा रहा था की नोट बंदी से कालाधन समाप्त हो जायेगा, ऐसा कुछ नही हुआ. अगर लगभग सभी बंद किये गए नोट बैंकों में वापिस आ गए तो कालाधन कहाँ खत्म हुआ?

कांग्रेस नेता पी चिदम्बरम ने ट्वीट कर मोदी सरकार पर तंज कसते हुए पुछा की क्या नोट बंदी कालेधन को सफ़ेद बनाने की योजना थी. आरबीआई के आंकड़ो पर उन्होंने लिखा की नोट बंदी से आरबीआई को 16 हजार करोड़ रूपए का फायदा हुआ लेकिन नए नोट छापने में 21 हजार करोड़ रूपए का खर्चा आया. ऐसे अर्थशास्त्री को जरुर नोबल पुरस्कार मिलना चाहिए. वही सरकार ने अपना बचाव करते हुए कहा की नोट बंदी की वजह से 56 लाख नए कर दाता सिस्टम से जुड़े जो नोट बंदी की वजह से ही संभव हुआ.

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