इतिहासकार इरफान हबीब ने भाषाओँ के धर्म से जोड़ने को दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया हैं. उन्होंने कहा कि उर्दू और हिंदी से धर्म का कोई लेना देना नहीं हैं.

हबीब ने कहा, उर्दू और हिंदी को धर्म से जोड़ दिया गया जबकि फारसी और संस्कृत के साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ. क्रिस्टोफर किंग ने एक सर्वे किया था जो बताता है कि 1879 में हिंदुस्तान में उर्दू समाचारपत्रों का सर्कुलेशन हिंदी समाचारपत्रों से आठ गुना अधिक होता था.

जश्न ए रेख्ता में उन्होंने कहा कि यह बताता है कि हिंदू, मुस्लिम या पंजाबी हर कोई उूर्द में पारंगत था। यह साबित करता है कि उस समय धर्म का इससे कोई लेना देना नहीं था. जब उनसे पूछा गया कि क्या उर्दू भाषा धीमी मौत मर रही है ? तो उन्होंने कहा,  समस्या यह है कि आप एक बच्चे को तीन भाषाएं सीखने के लिए मजबूर नहीं कर सकते.

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उन्होंने कहा, हिंदी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमारी राष्ट्र भाषा है. अंग्रेजी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके बिना भारत में कोई आपको नौकरी नहीं देगा। अब आप अपने बच्चे को कह नहीं सकते कि वह एक और भाषा सीखे.

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