कोरोना के संकट से निपटने के लिए मोदी सरकार की ओर से जारी किए गए 1.7 लाख करोड़ रुपये के पैकेज पर सवाल उठाते हुए नोबेल विजेता अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी ने कहा कि 500 रुपये से गरीबों का कुछ नहीं होने वाला है।

सीएनबीसी टीवी-18 न्यूज चैनल से बात करते हुए उन्होंने कहा, ‘इस पैकेज से ऐसा लगता है कि जैसे संकट कुछ सप्ताह का ही है। भारत के गरीबों की ही बात करें तो 500 रुपये कुछ भी नहीं है। यह ठीक नहीं है।’ उन्होंने कहा कि सरकार को कोरोना से निपटने के लिए पहले ही प्रयास शुरू करने की जरूरत थी।

सरकार के लॉकडाउन के बीच भी जरूरी सेवाएं जारी रहने के बयान पर उन्होने कहा, सरकार को लॉकडाउन को भ्रमित करने वाले बयान नहीं देने चाहिए। यह आइडिया की दुकानें खुली रहेंगी और कोई बाहर नहीं जा सकता, एक तरह का भ्रम पैदा करने वाली बात है। उन्होंने कहा कि इसी के चलते पुलिस भ्रमित थी और कई जगहों पर वह दुकानों को बंद करती दिखाई दी। इसके अलावा कई अन्य घोषणाओं में भी स्पष्टता का अभाव था।

प्रवासियों के पलायन पर उन्होने कहा, लोग गांवों की तरफ इसलिए भाग रहे हैं क्योंकि उनमें डर है और उन्हें यह पता नहीं चल रहा कि कोरोना वायरस की महामारी के बीच उन्हें कुछ मिलने की गारंटी है या नहीं। उन्होंने कहा कि लोगों की गांव की ओर वापसी पर उन्हें जरा भी हैरत नहीं है क्योंकि गांव में उनके पास जिंदगी गुजारने के लिए कुछ साधन तो है।

अभिजीत बनर्जी ने ‘इंडिया टुडे’ से कहा, आर्थिक दबाव (प्रवासियों पर) साफ है। गांव-घर में जीने के लिए उनके पास थोड़ी जमीन और अन्य साधन तो होंगे ही। इनमें से अधिकांश प्रवासी शहर से घर पैसे भी भेजते हैं। अब वे किस चीज के भरोसे रहेंगे। जिस कंस्ट्रक्शन साइट पर वे काम करते हैं, वहीं उन्हें रहने को मिल जाता है। अब ये साइट्स बंद हो गई हैं। ऐसे में वे कहां रहेंगे।

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