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नई दिल्ली | नोट बंदी के बाद महाराष्ट्र और गुजरात के नगर निगम चुनावो में बीजेपी को जीत मिली थी. खुद प्रधानमंत्री मोदी ने नगर निगम में मिली जीत को नोट बंदी से जोड़ते हुए ट्वीट किया था की हमें नोट बंदी के ऊपर लोगो का समर्थन मिल रहा है. कालेधन , आतंकवाद और नकली करेंसी की इस लड़ाई में मेरा साथ देने के लिए शुक्रिया. भारत की तमाम मीडिया ने भी इस जीत को नोट बंदी के समर्थन के तौर पर दिखाया था.

लेकिन हमेशा की तरह दिल्ली आते आते मोदी जी की तमाम हवा बदलने लगती है. नगर निगम के जिन चुनावो को नोट बंदी का समर्थन बताया जा रहा था वो दिल्ली में आकर समाप्त हो गया. दिल्ली में हुए मंडी समिति के चुनाव में बीजेपी को करारी हार मिली है. यहाँ आम आदमी पार्टी ने बीजेपी का सूपड़ा साफ़ कर दिया है. नोट बंदी के बाद बीजेपी की यह सबसे बड़ी हार है.

मंडी समिति चुनावो को MCD चुनावो से पहले का सेमी फाइनल माना जाता है. घोषित नतीजो में आम आदमी पार्टी ने विधासभा चुनावो जैसा प्रदर्शन दोहराते हुए बीजेपी का सूपड़ा साफ़ कर दिया. आम आदमी पार्टी ने 18 में से 14 सीट जीत कांग्रेस बीजेपी को करार झटका दिया है. मंडी समिति के नतीजे बीजेपी के लिए इसलिए भी चिंताजनक है क्योकि कुछ महीने बाद ही दिल्ली में MCD के चुनाव है. MCD में फिलहाल बीजेपी काबिज है.

नोट बंदी के बाद पुरे देश को अपने साथ बताने वाली बीजेपी और प्रधानमंत्री के लिए ये नतीजे काफी परेशानी पैदा करने वाले है. अगर महाराष्ट्र नगर निगम और गुजरात नगर निगम की जीत नोट बंदी के समर्थन में थी तो क्या मंडी परिषद् में बीजेपी की हार नोट बंदी के विरुद्ध मैंडेट माना जाए. बीजेपी और मोदी सरकार लाख दावे करते रहे की नोट बंदी पर जनता उनके साथ है लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है.

मंडी समिति के नतीजो से एक बार और सामने आई है की बीजेपी का कट्टर वोट बैंक , व्यापारी वर्ग उनसे खासा नाराज है. नोट बंदी से अगर किसी का सबसे ज्यादा नुक्सान हुआ है वो व्यापारी वर्ग है. इनके ऊपर आयकर विभाग लगातार छापे मार रहा है. देश में व्यापारियों को इस नजर से देखा जा रहा है जैसे सारा कालाधन इन्ही के पास हो. चूँकि मंडी समिति के चुनाव में व्यापारी और इसके सदस्य वोट डालते है इसलिए नतीजे इस और साफ़ इशारा कर रहे है की व्यापारी वर्ग बीजेपी को माफ़ करने के मूड में नही है.


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