भारतीय सेना के एक जवान मोहम्मद अब्बास खान का एक विडियो सामने आया हैं जिसमे वे अपनी मां का शव कंधे पर उठाकर 10 फुट बर्फ़ में धंसकर चलते नजर आ रहे हैं. उनका कहना हैं कि पीछे पांच दिन से वे अपनी 55 साल की मां का शव लेकर 10 फुट बर्फ़ में 32 किलोमीटर तक पैदल चले. इस दौरान न तो सरकार की और से और नही सेना की और से कोई मदद की गई.

कुपवाड़ा जिले के टंगधार के मोहम्मद अब्बास जम्मू कश्मीर लाइट इंफेंटरी रेजिमेंट में पठानकोट में तैनात है. उनकी मां सकीना बेगम की दिल की बीमारी के कारण 29 जनवरी को पठानकोट में मृत्यु हो गई थी. अब्बास मां का अंतिम संस्‍कार पैतृक गांव में करना चाहते थे, जो कुपवाड़ा सेक्‍टर में एलओसी के पास स्‍थित है. वे अपनी माँ का शव लेकर रवाना हों गए. लेकिन हिमस्खलन और बर्फबारी के बाद रास्ता बंद हो गया और वे कुपवाड़ा जिले के चौकीबल में फंस गए.

उन्होंने बताया कि उन्होंने सेना से मदद मांगी जिससे वो हैलीकॉप्टर के जरिए मां का शव लेकर अपने गांव जा सकें. करनाह का रास्ता श्रीनगर से हेलीकॉप्टर के जरिए ही तय हो सकता था क्योंकि पूरे रास्ते पर करीब आठ से दस फुट बर्फ थी. लेकिन सेना ने अपने हांथ खड़े कर दिए जिसके बाद कुपवाड़ा में ये सभी चार दिन तक फंसे रहे.उसके बाद उन्होंने पैदल ही शव ले जाने का फैसला किया. 32 किलोमीटर दोनों भाई मां के शव को लेकर 10 फुट बर्फ़ में धंसकर चलते रहे. बाद में आस-पास के गांववालों ने उनकी मदद की और तब जाकर वो शव के साथ गांव पहुंचे.

उन्होंने सेना से मदद के बारें में कहा कि हमें कहा गया था कि श्रीनगर से सिविल प्रशासन हमें हेलिकॉप्टर मुहैया करा देगा. श्रीनगर में तीन घंटे बाद बताया गया कि 50 हज़ार रुपए देने पर शव तंगधार तक वे पहुंचाएंगे. हमने किसी तरह पैसे जमा किया. आधे घंटे बाद कॉल आई कि पायलट मौसम का हाल देख कर डर गए हैं और वो उड़ान नहीं भरना चाहते.

कुपवाड़ा पहुँचकर हमने वहाँ के डिप्टी पुलिस कमिश्नर और एसएसपी कुपवाड़ा से बात की. उन्होंने हमें आश्वासन दिया कि हम 5 घंटे के अंदर साधना से तंगधार जाने वाले 52 किलोमीटर के रास्ते को साफ करा देंगे. हमने उनकी बात मानी और वहां रुके रहे. उनके आश्वासन पर हम वहां काफी देर तक रुके.

जब कुछ नहीं हुआ तो हमने सोचा कि हम पैदल ही चलें तो शायद पहुंच जाएं. हम लगभग 32 किलोमीटर आगे आए थे तब हमें दो फ़रवरी को एक फ़ोन आया कि हेलिकॉप्टर तैयार है, आप वापस आ जाओ. हम 10 फुट बर्फ़ में धंसकर कर आए थे. वापस जाने में 4-5 घंटे लगते, तो हमने उन्हें इनकार कर दिया. हम सीपी इलाके के रंगवाड़ गांव में पहुंचे थे, जहां पर गांव के कुछ लोगों ने हमारी मदद की. हम वहीं सीपी में रुक गए.

उधर, दूसरी तरफ से करनाह के तहसीलदार निसार रहमान, एडीएम शब्बीर अहमद अंद्राबी कुछ लोगों को साथ में लेकर किसी तरह साधना टॉप पर पहुंचे. हमारे गांव के 50 आदमी भी उनके साथ चल कर साधना टॉप पहुंचे. वहां से हम उनके साथ चलते हुए घर पहुंचे और फिर 2 फरवरी की रात को 9 बजे हम अपने गांव पहुंचे और मां के शव को दफन किया. शव का ध्यान रखने के लिए महिलाएं रात को बारी-बारी आकर मां के पास बैठती थीं और कुरान पढ़ती थीं.

मैंने मां के शव को लिया और सोचा कि शायद हम रात को जल्द पहुंच जाएं, लेकिन पूरी रात चलने पर भी हम केवल बर्फ़ पर आधा किलोमीटर ही चल सके थे. हमारे घरवालों ने हमें फोन किया और कहा कि आप ही मर जाओगे इतनी ठंड में वापस चले जाओ. हम लौट कर सीपी में रुके. वहां जब सुबह 50 लोगों का झुंड पहुंचा तब हमने कंधे पर मां के शव को उठाया और गांव की ओर चले. किसी एमएलए या राजनेता ने हमारी नहीं सुनी. लोगों ने ही हमारी मदद की.

विडियो देखने के लिए बीबीसी की रिपोर्ट देखे


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