दिल्ली: देश के 48% पुलिसकर्मियों को लगता है कि मुसलमान आपराधिक प्रवृत्ति के होते हैं। इनमें 14% को लगता है कि उनके अपराध करने की संभावना बहुत हद तक है, जबकि 34% को लगता है कि यह प्रवृति काफी हद तक है। दूसरी ओर, 56% पुलिसकर्मियों का मानना है कि ऊंची जाति के हिंदू अपराध की ओर नहीं जाते। मंगलवार को जारी लोकनीति और काॅमन कॉज की रिपोर्ट में यह जानकारी सामने आई है।

सर्वे की रिपोर्ट ‘2019 Status of Policing in India’ के अनुसार, सर्वे में शामिल कुल पुलिसकर्मियों में से 35 प्रतिशत मानते हैं कि यदि भीड़ किसी गोकशी के मामले में आरोपी को सजा देती है, तो यह स्वभाविक बात है। इसी तरह 43 प्रतिशत पुलिसकर्मी मानते हैं कि किसी बलात्कार के आरोपी को भी भीड़ द्वारा सजा देना स्वभाविक प्रतिक्रिया है।

यह रिपोर्ट मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जे. चेलामेश्वर द्वारा रिलीज किया गया।सर्वे देश के 21 राज्यों और 11000 पुलिस स्टेशन के 12,000 पुलिसकर्मियों और उनके परिजनों से बातचीत के आधार पर तैयार किया गया है। सर्वे में शामिल पुलिसकर्मियों में से 37 प्रतिशत का ये भी मानना है कि छोटे-मोटे अपराध के लिए सजा देने का अधिकार पुलिस को मिलना चाहिए और इसके लिए कानूनी ट्रायल नहीं होना चाहिए।

Courtesy: Lokbharat

जातिगत मामले में 5 में से एक पुलिसकर्मी को लगता है कि एससी-एसटी एक्ट के तहत आने वाले मामले झूठे और किसी खास मकसद से दायर किए जाते हैं। इसी तरह महिलाओं के खिलाफ हिंसा के मामले में उनकी राय पूर्वग्रह से प्रेरित है। हर पांच में एक पुलिसकर्मी को लगता है कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा के केस फर्जी होते हैं।

सर्वे के अनुसार देश में पुलिसकर्मी औसतन 14 घंटे प्रतिदिन काम करते हैं, जबकि 80 फीसदी पुलिसकर्मी आठ घंटे से ज्यादा ड्यूटी करते हैं। देश भर में 50 फीसदी पुलिसकर्मी ओवरटाइम करते हैं। पुलिसकर्मियों के पांच में से तीन परिवार वालों को लगता है कि उन्हें रहने के लिए दिया गया सरकारी मकान घटिया है।

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