अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद में उच्चतम न्यायालय के नौ नवंबर के फैसले पर पुनर्विचार के लिये शुक्रवार को चार नई याचिकायें दायर की गई। शीर्ष अदालत में ये पुनर्विचार याचिकायें मौलाना मुफ्ती हसबुल्ला, मोहम्मद उमर, मौलाना महफूजुर रहमान और मिसबाहुद्दीन ने दायर की हैं। ये सभी पहले मुकदमें में पक्षकार थे।

याचिकाओं में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला सन 1992 में मस्जिद ढहाए जाने को मंजूरी देने जैसा है। अवैध रूप से रखी गई मूर्ति के पक्ष में फैसला सुनाया गया। अवैध हरकत करने वालों को ज़मीन दी गई। याचिकाओं में कहा गया है कि हिंदुओं का कभी वहां पूरा कब्ज़ा नहीं था। मुसलमानों को पांच एकड़ जमीन देने का फैसला पूरा इंसाफ नहीं कहा जा सकता। सुप्रीम कोर्ट से मांग की गई है कि वह अपने नौ नवंबर के फैसले पर रोक लगाए। मामले पर दोबारा विचार करे।

याचिकाओं में कहा गया है कि ये याचिकाएं शांति और सद्भाव में खलल डालने के लिए नहीं बल्कि न्याय हासिल करने के लिए दाखिल की गई हैं। मुस्लिम संपत्ति हमेशा ही हिंसा और अनुचित व्यवहार का शिकार हुई है। फैसले में 1992 में मस्जिद के ढहाए जाने का फायदा दिया गया है। अवैध रूप से रखी गई मूर्ति कानूनी रूप से वैध नहीं हो सकती और इसके पक्ष में फैसला सुनाया गया है।

कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट का 9 नवंबर का फैसला बाबरी मस्जिद के विनाश, गैरकानूनी तरीके से घुसने और कानून के शासन के उल्लंघन की गंभीर अवैधताओं को दर्शाता है। निर्विवाद तथ्य यह है कि हिंदू कभी भी एक्सक्लूसिव कब्जे में नहीं रहा। अवैधता में पाए गए सबूतों के आधार पर हिंदूओं ने दावा किया है।

याचिकाओं में सुप्रीम कोर्ट के पांच एकड़ जमीन देने के फैसले पर भी सवाल उठाया गया है। कहा गया है कि पूजा स्थल को नष्ट करने के बाद ऐसा कोई “पुनर्स्थापन” नहीं हो सकता। यह कोई कामर्शियल सूट नहीं था बल्कि सिविल सूट था। सुप्रीम कोर्ट का ये निष्कर्ष त्रुटिपूर्ण है कि यह दिखाने के लिए सबूत हैं कि हिंदुओं ने मस्जिद के परिसर में 1857 से पहले पूजा की थी। यह दिखाने के लिए सबूत हैं कि मुस्लिम 1857 और 1949 के बीच आंतरिक आंगन के एक्सक्लूसिव कब्जे में थे। कोर्ट का ये निष्कर्ष सही नहीं है कि मस्जिद पक्ष प्रतिकूल कब्जे को साबित करने में सक्षम नहीं रहा।

इसके साथ ही पीस पार्टी ने अपनी याचिका दाखिल की है। इस याचिका में कहा गया कि 1949 तक विवादित स्थल पर मुस्लिमों का अधिकार था। 1949 तक सेंटल डोम के नीचे नमाज़ अदा की गई थी और कोई भी भगवान की मूर्ति डोम के नीचे तब तक नही थी। पुरातत्व विभाग की रिपोर्ट में भी इस बात के साक्ष्य नही की मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाई गई। 1885 में बाहरी अहाते में राम चबूतरे पर हिन्दू पूजा करते थे आंतरिक हिस्सा मुसलमानों के पास था।

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