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जेएनयू में कथित तौर पर राष्ट्रविरोधी नारेबाजी के मामले में दिल्ली पुलिस द्वारा हाल ही में दायर की कन्हैया कुमार और उसके साथियों के खिलाफ चार्जशीट के चलते राजद्रोह शब्द एक बार फिर से चर्चा में आ गया है।

नैशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के 2014 से लेकर 2016 के आंकड़ों के मुताबिक, कुल 179 लोगों को राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया। इनमे से जिन 18 लोगों के खिलाफ राजद्रोह के मामले में कानूनी ट्रायल पूरे हुए, उनमें से सिर्फ 2 को दोषी साबित किया जा सका। बाकी सभी बरी हो गए।

बता दें कि एनसीआरबी के डेटाबेस में सिर्फ इसी समयावधि के लिए ही राजद्रोह से जुड़े मामलों का डेटा उपलब्ध है। हालांकि, 2016 के आखिर तक पुलिस ने इनमें से 80 पर्सेंट से ज्यादा मामलों में चार्जशीट फाइल नहीं की है। अदालत में राजद्रोह से जुड़े 90 प्रतिशत मामलों में ट्रायल लंबित है।

एक सीनियर पुलिस अफसर ने द इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में कहा, ‘अगर आतंकवाद के कुछ मामलों को छोड़ दें जहां राजद्रोह का केस भी लगाया जाता है तो अधिकतर राजद्रोह के मामले राजनीतिक होते हैं। ये सरकार के खिलाफ प्रदर्शन  करने वाले किसी सामाजिक कार्यकर्ता, समूह या छात्रों के खिलाफ लगाए जाते हैं। पुलिस को भी इन मामलों का अंत पता है, इसलिए बिना दबाव के वे भी शायद ही इन मामलों पर ध्यान केंद्रित करते हैं। चूंकि, इन मामलों का धरातल मजबूत नहीं होता, इसलिए कोर्ट जाने पर ये टिक नहीं पाते।’

एनसीआरबी के डेटा से यह भी पता चलता है कि 2014 की शुरुआत से राजद्रोह के मामलों में गिरफ्तारियों में इजाफा हुआ है। साल की शुरुआत में सिर्फ 9 लोग ऐसे थे जो इन मामलों में कस्टडी में थे या चल रही जांच के दौरान जमानत पर थे। वही, साल के आखिर तक, 58 गिरफ्तारियां दर्ज की गईं। हालांकि, पुलिस सिर्फ 16 आरोपियों के खिलाफ ही चार्जशीट दाखिल कर पाई।

कोर्ट की बात करें तो 2014 में कुल 29 राजद्रोह के आरोपी ट्रायल के लिए लाए गए। इनमें लंबित मामलों वाले आरोपी भी शामिल हैं। हालांकि, उस साल उनमें से सिर्फ 4 के खिलाफ ही ट्रायल पूरा हो पाया। डेटा के मुताबिक, 3 आरोपी बरी हो गए। 2015 में राजद्रोह के आरोप में कुल 73 लोग गिरफ्तार किए गए। पिछले साल के बैकलॉग को जोड़ लें तो लंबित जांच वाले आरोपियों की संख्या बढ़कर 124 हो गई।

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