Monday, September 20, 2021

 

 

 

कभी थे आजाद हिंद फौज के सिपाही, आज 90 की उम्र में मांग रहे भीख

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झांसी. झांसी के रहने वाले और आजाद हिंद फौज में शामिल एक 90 साल के श्रीपत आज भीख मांगने को मजबूर हैं। वे चौराहे-चौराहे भीख मांगकर किसी तरह जिंदगी गुजर बसर कर रहे हैं।

लोगों से भीख मांगते 90 साल के श्रीपत।– फिलहाल पत्नी के साथ हंसारी एरिया में एक झोपड़ी में रहने वाले श्रीपत ने बताया कि कभी वह सात एकड़ जमीन के मालिक थे।

– उनके पास एक लाइसेंसी बंदूक थी, लेकिन उनके बेटे तुलसिया ने नशे और जुएं की लत के कारण सब कुछ बेच दिया।
– कुछ दिनों तक खेत में मजदूरी करने के बाद हाथ-पैर ने काम करना बंद कर दिया।
– अब ये नौबत आ गई है कि चौराहे-चौराहे पर जाकर भीख मांगना पड़ता है।
कैसे फौज में शामिल हुए थे श्रीपत?
– मूलत: ओरछा स्टेट के कुरा गांव निवासी श्रीपत ने जब जन्म लिया, तब देश में अंग्रेजों का साम्राज्य था।
– वह अपने पिता से महारानी लक्ष्मीबाई, चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह और सुभाषचंद्र बोस की कहानियां सुनते थे।
– इसके बाद उनमें देश के लिए ऐसा प्रेम बढ़ा कि वह बचपन में ही क्रांतिकारियों के संपर्क में रहने लगे।
– इस दौरान उन्हें पता चला कि नेताजी सुभाषचंद्र बोस झांसी आ रहे हैं।
– वह उनसे मिलने के लिए झांसी आए और उनके दिए भाषण बहुत प्रभावित हुए।
– ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ जैसे नारे से प्रभावित श्रीपत ने आजाद हिंद फौज में शामिल होने के लिए बंदूक का लाइसेंस तक बनवाया।
फिर क्या हुअा?
– श्रीपत बताते हैं, उन्हें काफी दुख हुआ जब वह आजाद हिंद फौज की ओर से लड़ने के लिए किसी कारण से बर्मा नहीं जा सके।
– जब नेताजी के निधन की सूचना आई तो उन्हें बहुत दुख हुआ।
– इसके बाद उन्होंने अपनी बंदूक कई क्रांति‍कारियों को आजादी की लड़ाई लड़ने के लिए दी।
क्या कहना है कांग्रेसी नेता का?
– कांग्रेस के सीनियर लीडर भानू सहाय ने बताया कि जब सुभाषचंद्र बोस 1939 में झांसी आए थे, उस समय श्रीपत अपने गांव से पैदल चलकर झांसी पहुंचे थे।
– नेताजी जैसे ही श्रीपत के सामने से निकले, श्रीपत ने उनके पैर छुए। इसके बाद नेताजी ने उन्हें गले लगा लिया।
– दोनों की जहां पहली मुलाकात हुई थी, उस जगह को आज लोग सुभाषगंज के नाम से जानते हैं।
– श्रीपत ने नवंबर 1943 में आजाद हिंद फौज ज्वाइन की थी, लेकिन जब नेताजी ने बर्मा युद्ध के लिए संदेशा भेजा तो श्रीपत और उनके साथियों पर अंग्रेजी हुकूमत की नजरें थीं।
– इसी वजह से श्रीपत और उनके साथी युद्ध में शामिल नहीं हो सके थे।
फैजाबाद के गुमनामी बाबा का खुला था बक्सा
बता दें, नेताजी सुभाषचंद्र बोस होने के दावे के बीच गुमनामी बाबा आजकल काफी चर्चा में हैं।
– बीते दिनों यूपी के फैजाबाद ट्रेजरी में बंद उनके बक्से को 10 मेंबरों वाली एडमिनिस्ट्रेटिव कमि‍टी ने खुलवाया था।
– इसमें अब तक एक गोल फ्रेम का चश्मा, रोलेक्स घड़ी, तांत की साड़ी, काली की मूर्ति, बंगाली भाषा में लिखे साहित्य और पत्र के साथ-साथ बंगाल के बने कुछ सामान मिले थे। (bhaskar)

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