एंड व्हाट इज़ दिस इथियोपियन कॉल्ड?

रेस शुरू होने से कुछ पहले मोरक्को के धावक रादी बेन अब्दुस्सलाम को डाक्टर के पास रिपोर्ट करना पड़ा. एक एथलीट वहां पहले से लेटा हुआ था. उस धावक को याद करते हुए रादी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है – “मैं उसके पैरों को देख कर हैरान रह गया. मुझे बाद में पता लगा वह नंगे पैर भागा करता है. उसके पैरों के तलुवे मोटे और कोयले की तरह काले थे. मुझे याद है मुझे उसके पैरों का स्पर्श करने की इच्छा हुई जिनकी कड़ियल त्वचा किसी बड़े मिलिट्री ट्रक के टायर जैसी लग रही थी. मुझे पक्का यकीन था कि मेरे ऐसा करने से उसे कुछ भी महसूस नहीं होगा लेकिन उसके तलुवों की त्वचा बहुत संवेदनशील थी – मैंने उस पर अपनी उंगली ज़रा सा फिराई ही थी कि वह झटके से बिस्तर पर उठ बैठा और अजीब, आश्चर्यचकित निगाहों से मुझे देखने लगा.”

ये अबेबे बिकिला के नंगे तलुवे थे जिन पर भागकर उसने वर्ल्ड रेकॉर्ड तोड़ते हुए 1960 के रोम ओलंपिक की मैराथन में सोने का मैडल हासिल किया था. 7 अगस्त 1932 को आज भी भुखमरी का देश माने जाने वाले इथियोपिया के एक पहाड़ी गांव के चरवाहों के परिवार में जन्मे अबेबे बिकिला का बचपन अपने घर के आसपास के इलाके में बकरियां चराते बीता था. उस कड़ियल इलाके में जमे हुए लावा की चट्टानें थीं जहाँ बहुत कम घास उगा करती थी. घास की तलाश में बारह-पन्द्रह किलोमीटर की दूरी तय करना रोजमर्रा का काम था.

उन्नीस साल की उम्र में बिकिला रोजगार की खोज में राजधानी अदिस अबाबा पहुंचे जहाँ एक साल की बेरोजगारी के बाद उन्हें इम्पीरियल बॉडीगार्ड में नौकरी मिल गयी. युवा अबेबे बिकिला फुटबॉल, वॉलीबॉल और बास्केटबॉल के अच्छे खिलाड़ी थे.

(फोटो: रोम ओलम्पिक में अबेबे बिकिला. उनके पीछे रादी बेन अब्दुस्सलाम हैं)

इम्पीरियल बॉडीगार्ड के स्पोर्ट्स ट्रेनर स्वीडिश मूल के ओन्नी निस्कानेन ने बिकिला के भीतर लम्बी दूरी के धावक के गुण देखे और 1956 से उन्हें ट्रेनिंग देना शुरू किया. निस्कानेन की कोशिशों से ही उसी साल मेलबर्न में हुए ओलम्पिक खेलों में पहली बार इथियोपियाई एथलीट हिस्सा ले सके थे अलबत्ता उन्हें कोई ख़ास सफलता नहीं मिली. निस्कानेन निराश नहीं हुए और 1958 में तीन इथियोपियाई एथलीट्स को लेकर स्वीडन चले आये जहाँ उन्हें बेहतर ट्रेनिंग दी सकती थी.

मैराथन दौड़ का क्लासिकल स्कूल 42 किलोमीटर की इस रेस को दो हिस्सों में बांटता है – पहला 30 किलोमीटर का हिस्सा धावक के स्टेमिना पर निर्भर रहता है जबकि आखिर के 12 किलोमीटर उसकी सहनशीलता का इम्तहान लेते हैं. बिकिला का जीनियस इस तथ्य में समाहित था कि वे पूरे के पूरे 42 किलोमीटर सहनशीलता वाले मोड में भागा करते थे. स्टेमिना कोई मसला था ही नहीं. रोम ओलंपिक की मैराथन जीतने के बाद उन्होंने कोच ओन्नी निस्कानेन से कहा था कि वे दस-पंद्रह किलोमीटर और भाग सकते थे. इसके अलावा पहाड़ी इलाकों में पैदा होना भी उनके काम आया. वैज्ञानिक प्रमाण है कि 2000 मीटर की ऊंचाई पर 12 किलोमीटर भागना निचली जगहों पर 30 किलोमीटर भागने के बराबर माना जा सकता है.

ट्रेनिंग के बाद जुलाई 1960 में रोम ओलम्पिक के लिए ट्रायल शुरू हुए. बिकिला तब तक अपने देश का रेकॉर्ड ध्वस्त कर चुके थे. ट्रायल की फाइनल हीट में 50 धावक दौड़े. बिकिला ने आठ साल पहले बने ओलम्पिक रेकॉर्ड को भी पीछे छोड़ डाला. उनके अलावा एक और धावक अबेबे वाक्जीरा को रोम जाने के लिए चुना गया. दोनों को दो-दो सूट और डेढ़ सौ डॉलर की पॉकेट मनी दी गयी और इथियोपिया के सम्राट से मिलाने ले जाया गया. उन्हें देख कर सम्राट ने कहा – “इतने दुबले लड़के जीत कैसे सकते हैं?”

नील आसमान पर चमकते सूरज के नीचे सम्राट मार्कस औरेलियस की प्राचीन प्रतिमा के नजदीक स्थित पियात्सा देल काम्पीदोग्लियो से 10 सितम्बर 1960 को शाम 5:30 बजे रेस शुरू हुई. बिकिला और वाक्जीरा को नंगे पाँव देख कर बहुत से दर्शकों ने उनका मजाक उड़ाया. बिकिला 11 नंबर की जर्सी में थे. उस दृश्य को याद करते हुए ऑस्ट्रियाई पत्रकार-फोटोग्राफर हैरल्ड लेखेनबर्ग ने लिखा – “उनके स्वीडिश ट्रेनर ने बताया था कि वे दोनों फर्स्ट-क्लास धावक थे लेकिन दर्शकों के लिए वे इथियोपिया से आए दो ऐसे गरीब लड़के थे जिनके नामों का उच्चारण करने में जीभ को तकलीफ होती थी.” कुल 69 एथलीट भाग रहे थे. रूस के सर्गेई पोपोव पर सबकी निगाहें थीं जिन्होंने दो साल पहले 2 घंटे 15 मिनट 17 सेकेण्ड का विश्व कीर्तिमान स्थापित कर रखा था. उसी सुबह बिकिला के पैर देख चुके रादी बेन अब्दुस्सलाम भी फेवरेट माने जा रहे थे. आप उस रेस का वीडियो देख सकते हैं जिसमें रेस शुरू होने से पहले अपने दोस्त से मजाक करते हंसते हुए पोपोव को देखा जा सकता है. जब कैमरा बिकिला के तनावभरे चहरे को दिखाता है तो कमेंटेटर कहता है – “एंड व्हाट इज़ दिस इथियोपियन कॉल्ड?”

शुरू में बिकिला रेस में कहीं नहीं हैं लेकिन 15 किलोमीटर आते-आते वे टॉप चार में आ जाते हैं. फिर 18 किलोमीटर के बाद से रेस के आखिर तक बिकिला और रादी बेन अब्दुस्सलाम के बीच मुकाबला चलता है. रेस ऐतिहासिक रोम की सडकों पर बड़े-बड़े स्मारकों के पास से गुजरती जाती है. 39.3 किलोमीटर पर डोमिन को वादिस का चर्च आता है जहाँ के बारे में विख्यात है कि रोम से भागने से पहले सेंट पीटर ने ईसा मसीह से मुलाक़ात की थी. कुछ मिनटों बाद वे एक ऐसे स्मारक के पास से गुजरते हैं जिसे बिकिला को उनके कोच ने पिछली रात दिखाया था. चौथी शताब्दी एक इस ओबेलिस्क को कोई पच्चीस साल पहले मुसोलिनी के सैनिक बिकिला के देश इथियोपिया से लूट कर लाये थे.

यहाँ से फिनिश लाइन ठीक दो किलोमीटर दूर है. रात हो चुकी है. बिकिला एक निगाह स्ट्रीटलाइट की रोशनी में चमक रहे उस स्मारक पर डालते हैं. अब तक उनके और रादी बेन अब्दुस्सलाम के बीच कुल पांच मीटर का फासला है. बिकिला फाइनल गीयर लगाते हैं. रादी बेन अब्दुस्सलाम का दूर-दूर तक अता पता नहीं चलता. फिनिश लाइन का टेप छूने से ठीक पहले बिकिला अपने हाथों को थोड़ा सा उठाते हैं. अधिकारी उनकी तरफ भागते हैं लेकिन वे झुक कर अपने पैरों के अंगूठों को छूते हैं और हल्की जॉगिंग करने लगते हैं. कोई उनके गिर्द कम्बल लपेटना चाहता है लेकिन वे मना कर देते हैं. ओन्नी निस्कानेन सुरक्षा घेरा तोड़कर अपने शिष्य के पास आते हैं. दर्शक यह देख कर हैरान हैं कि बिकिला बिलकुल शांत दिख रहे हैं अलबत्ता उन्होंने ओलम्पिक रेकॉर्ड को आठ मिनट से बेहतर कर दिया है. आधे मिनट बाद रादी बेन अब्दुस्सलाम स्टेडियम में घुसते हैं. अब तक अबेबे बिकिला कन्धों पर उठाये जा चुके हैं और उनके चहरे पर आखिरकार विजेताओं वाली मुस्कान खिल चुकी है.

बिकिला की जीत समूचे अफ्रीका की जीत थी. ओलम्पिक में गोल्ड जीतने वाले वे पहले काले अफ्रीकी बन गए थे. बिकिला के नंगे पैर अफ्रीकी स्वातंत्र्य और आत्मसम्मान के प्रतीक बन चुके थे.

1964 के टोक्यो ओलंपिक से 15 दिन पहले बिकिला का अपेंडिक्स का ऑपरेशन हुआ लेकिन उन्होंने यहाँ भी गोल्ड मैडल जीता. इस बार 2 घंटे 12 मिनट 11.2 सेकेण्ड के विश्व रेकॉर्ड समय के साथ. उनसे पहले दो लगातार मैराथन गोल्ड कोई नहीं जीत सका था. सोलह साल बाद पूर्वी जर्मनी के वाल्डेमार ने यह कारनामा दोहराया लेकिन इसमें मास्को ओलम्पिक शामिल थे जिसका आधे से ज्यादा देशों ने बहिष्कार किया था.

अपने नंगे पांवों और उनके छालों को दुनिया की तारीख में दर्ज कराने वाले अबेबे बिकिला कुल 41 साल जी सके. कभी जीवन में आपको प्रेरणा की कमी महसूस हो तो फुर्सत निकाल कर किसी भी काले खिलाड़ी के संघर्ष और सफलता की कहानी को खोज कर पढ़िए-जानिये. यकीन मानिए बीसवीं शताब्दी इन्हीं काले चैम्पियनों के जीवट और आत्मसम्मान की शताब्दी है.

Note – इस लेख की अशोक पण्डे की फेसबुक वाल से लिया गया है, मूल लेख इस लिंक पर जाकर पढ़ सकतें हैं क्लिक करें 

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