Sunday, October 17, 2021

 

 

 

इस्लाम के बुनियादी मूल्यों के प्रशंसक थे विवेकांनद

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ग़ुलाम रसूल देहलवी

स्वामी विवेकानंद उन बड़े भारतीय आध्यात्मिक गुरुओं में से एक हैं जो समाज सेवा, ईश्वर की एकता, वैश्विक भाईचारे और धार्मिक सद्भाव के समर्थक रहे। धार्मिक पूर्वाग्रह के वह सख्त विरोधी थे। उनका मानना था कि भगवान तक पहुंचने के रास्ते तंग, अवरुद्ध, बंद या किसी एक विचारधारा तक सीमित नहीं हैं। सभी धर्म अपने अंतिम लक्ष्य में एक हैं। जैसे हिंदू दर्शन के अनुसार मोक्ष का माध्यम निर्वाण (दुख से मुक्ति या ब्रह्म से मिलाप) जीवन का वास्तविक और अंतिम लक्ष्य है, उसी तरह इस्लामी अध्यात्मिकता (सूफीवाद) के अनुसार मनुष्य की सबसे बड़ी सफलता विसाले इलाही यानी अल्लाह के साथ अंतरंग संबंध है। दुर्भाग्य से, हिंदू और मुसलमान दोनों समुदायों के कुछ धार्मिक कट्टरपंथी अपने गलत उद्देश्यों को पूरा करने के लिए हिंदुस्तान के दो सबसे बड़े धर्मों के सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक संबंधों को बिगाड़ रहे हैं।

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वे यह अफवाह भी फैला रहे हैं कि स्वामी विवेकानंद इस्लाम के विरोधी थे। सच यह है कि स्वामी जी इस्लाम के बुनियादी मूल्यों के बड़े प्रशंसक थे। उनका विश्वास था कि पूरी दुनिया में इस्लाम के अस्तित्व का एकमात्र कारण उसके अंदर छुपे आध्यात्मिक नैतिक मूल्य हैं। ‘स्वामी विवेकानंद की शिक्षा’ किताब में एक अध्याय ‘मुहम्मद और इस्लाम’ का एक अंश पठनीय है। मैं पाठकों के सामने इसके कुछ अंश इस आशा के साथ नकल करता हूं कि पाठक इस्लाम और पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) से संबंधित स्वामी विवेकानंद के ऐतिहासिक बयान के महत्व को खुद समझेंगे- ‘मुहम्मद साहब ने अपने जीवन द्वारा यह बात प्रदर्शित की कि मुसलमानों के बीच सही संतुलन होना चाहिए। पीढ़ी, जाति, रंग या लिंग का कोई सवाल पैदा नहीं होता। तुर्की का सुल्तान अफ्रीका के बाजार से एक हब्शी खरीद सकता है, और जंजीरों में उसे जकड़कर तुर्की ला सकता है। लेकिन वह हब्शी सुल्तान की बेटी से शादी भी कर सकता है। इसकी तुलना इससे करें कि हब्शियों और अमेरिकी भारतीयों के साथ देश (संयुक्त राज्य अमेरिका) में कैसा व्यवहार किया जाता है।’

‘जैसे ही एक व्यक्ति मुसलमान हो जाता है, इस्लाम के सभी अनुयायी किसी प्रकार का भेदभाव किए बिना उसे एक भाई के रूप में स्वीकार कर लेते हैं। यह किसी अन्य धर्म में नहीं पाया जाता। अगर कोई अमेरिकी भारतीय मुसलमान बन जाता है तो तुर्की के सुल्तान को उसके साथ खाना खाने में कोई आपत्ति नहीं होगी। लेकिन इस देश में मैंने अभी तक ऐसा कोई चर्च नहीं देखा जहां गोरा और हब्शी कंधे से कंधा मिलाकर भगवान की पूजा के लिए झुक सकें।’

‘यह कहना उचित नहीं है कि मुसलमान इस पर विश्वास नहीं करते कि महिलाओं के पास भी आत्मा होती है। मुझे कुरान में एक भी आयत ऐसी नहीं मिली जो कहती हो कि महिलाओं के पास कोई आत्मा नहीं है। कुरान यह सिद्ध करता है कि उनके पास आत्मा है। भारत का इस्लाम किसी भी अन्य देश के इस्लाम से पूरी तरह अलग है। कोई अशांति या फूट तभी होती है, जब अन्य देशों से मुसलमान आते हैं और हिंदुस्तान में मुसलमानों के बीच उन लोगों के साथ न रहने का प्रचार करते हैं जो उनके धर्म के नहीं हैं। हमारे देश के लिए दो महान विचारधाराओं की प्रणाली इस्लाम और हिंदू धर्म का संगम, वेदांत का दिमाग और इस्लाम का शरीर ही सिर्फ एक उम्मीद है। अपनी कल्पना में मैं हिंदुस्तान का भविष्य पूर्ण, मतभेद और अराजकता और विवाद व संघर्ष से मुक्त, शानदार और अपराजेय तब देखता हूं जब वेदांत का दिमाग और इस्लाम का शरीर दोनों मिल जाएंगे।’

विवेकानंद ने ऐसे मुसलमानों की आलोचना की जो खुद मुसलमानों या गैर मुसलमानों के खिलाफ क्रूरता और अत्याचार करते हैं। उन्हें विश्वास था कि मुसलमानों की वर्तमान परिस्थिति इस्लाम के सार्वभौमिक संदेश से बिल्कुल विपरीत है। उनका कहना था- ‘मुसलमानों के बीच जब कोई विचारक आया तो वह उनके बीच जारी क्रूरता का विरोध करता रहा। उसने अपने धर्म के साथ कभी खिलवाड़ नहीं किया, सीधे रास्ते से सच्चाई का पर्दा उठाया।’

साभार http://blogs.navbharattimes.indiatimes.com/

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