सौ साला गिरोह

2सौ साला गिरोह-2 ★★★★★★

चारागरी बीमारी-ए-दिल की
रस्म-ए-सहर-ए-हुस्न नही
वरना दिलबर-ए-नादां भी
किस मर्ज का चारा जाने है !

तो भारतीय एशियाई भीरु समाज अपने मनोभावों पर नियंत्रण रखने में असमर्थ रहा नतीजतन जो कड़े फैसले गाढ़े समय में लेने चाहिए थे वे स्थगित रहे जहां “डीलिंग विद आयरन हैंड पालिसी” चाहिए थी वहां स्वार्थी उदारतावाद में पलायन कर गये और जब स्थिति बिगड़ी तो दंगे आगजनी जातीय हिंसा और राज्य दमन ने स्थिति को दबा दिया पर ज्वलंत सवाल सुलगते रहे भूसे में लगी आग की तरह और हमारी चेतना में एक मंद सा न चढने न उतरने वाला सरसामी बुखार छाया रहा देश के भीतर दो तीन देश थे एक वो जो नौकरियों,सत्ता प्रतिष्ठानों में साहित्य-कला में, जमीन-दुकान-व्योपार में अपनी मिल्कियत रखता था आजादी के बाद भी बने रहना था दूसरा वो जिसके लिए आजादी के कोई मायने न थे मसलन आदिवासी और तीसरा वो दलित-दमित समाज था जिसका देश पर मजबूत दावा था उसे संविधान की मोटी किताब और प्रतीकों के सम्मोहन में ऐसे बांधा गया,sc/st/obc में इस खूबसूरती से बांटा गया कि आज भी वे छटपटाते हैं पर बंधनमुक्त नहीं हो पाते ! जो मुसलमान यहीं रुक गये वो इस राज्य की परोपजीवी उपरी लेयर के लिए आज वरदान बन गये त्रिराष्ट्र की इस जद्दोजहद के बीच उनका राज सुरक्षित है मालो-असबाब-जर-जमीन-व्यौपार उनके कब्जे में है और दलित मसीहा का संविधान इसकी सुरक्षा में लाखों सैन्य-पुलिस की लाठी गोलियों से लैस खड़ा है ! इससे बड़कर विद्रूप क्या होगा जब शाशित की ताकत से शाशित पर ही जुल्मत और तारीक कायम है ? दलित-पसमांदा चिंतक बस चिंता में घुल-घुलकर “संघम् शरणम् गच्छामि” को बुद्ध बचन समझ संघ (RSS) की शरण में जाकर बुद्धि-विसर्जन कर गये !

चलिए फिर वहीं “सौ साला गिरोह” की संगे बुनियाद छापा-किताबजनी पर वापस लौटते हैं जहां अंग्रेज हाकम अपना माल असबाब समेट रहे थे यूनियन जैक शान से/सम्मान से उतरा और तिरंगा फहराया ! इस घटना को श्वेत-श्याम डाकूमेंट्रीज में देखकर आज भी मन में ये पंक्तियाँ सहज गूंजती हैं-
“क्या आजादी महज तीन रंगों का नाम है
जिन्हें एक थका हुआ पहिया ढोता है ?
या आजादी का कुछ और भी मतलब होता है ? “

खैर इस पर तबसरा आप अपनी जेहनी समझ से कीजीए मैं चला छापेखाने के अंदर जहां गिरोह ने किताबें/अखबार छापे ये कोई मार्टिन लूथर जैसा परदा फाड़ साहित्य न था ये तो रीतीकाल, भक्तिकाल, आयरन एज, ब्रोंज एज,,स्टोन एज, प्री-स्टोन एज (रहम मेरे मालिक ! ) हर किताब हर शब्द मुंडी में घुसकर इस कदर आह्लादित करता था अच्छा खासा विलायत पास भी जमीन में लोटकर चार हाथ पैरों पर चलकर आध्यात्म के अंधेरे वर्षा वन में भागने को उतावला हो जाता था तो समझिए पढने वालों का क्या हाल हुआ होगा ? दिन भर कभी उसे आधुनिकता की ओर भी दौड़ना था और फिर पुरा पाषाण काल के गौरव की तरफ भी जयकारे मार दौड़ना था ! अजी आज भी सड़क से लेकर संसद तक अकादमिक परिसरों से लेकर बाजार-खेत-खलिहानों तक गांव-शहर की हलचल देख लीजीए कन्फ्यूज भीड़ है तय नहीं कर पाती और गिरोह इनका सरपरस्त है उसके लिए “बाचीजा-ए-अतफाल” हो गया ये खित्ता !

उधर पड़ोस में एक हूण देश चीन है वहां के नाटे चपटे चुप्पे लोगों ने जिनको कि हमसे भी दो साल बाद आजादी हासिल हुई क्या कर डाला है ? चीन-ईरान रेल लाईन 9500 किलोमीटर तक बछाकर सफल संचालन पुराने रेशम रुट कारवां मार्ग पे ये रेल -40 से +50 तक के वातावरण में वातानुकूलित चलती है और हम क्या कर रहे हैं ? जो कर रहे हैं रोज टीवी अखबार दिखा ही रहे हैं !
हम दिल से बीमार और दिमाग से कुंद बनाये गये अधकपार-अधबानरों की गुलामी हमने नहीं हमारी तीन पीढी पहले हमारे पुरखों ने अपनी नियती मान ली और आज हम इस भ्रम को यहां तक मान बैठे हैं कि यही हमारी जीन खून संरचना हो गयी है तो “मीर तकी मीर” की गजल का अगला मिसरा सुनिये और राजनैतिक अर्थ समझिए-

“महर-ओ-वफा-ओ-लुत्फ-ओ-इनायत
एक से वाकिफ़ इनमें नहीं
और तो सब कुछ तंज-ओ-कनाया रम्ज-ओ-इशारा जाने है !”