सीरिया में हुए रासायनिक हमले के बाद दुनिया के दो सबसे बड़े और ताकतवर देश, दो महाशक्तियां एक बार फिर से आमने-सामने हैं. सीरिया के बचाव में रूस ने अपना एक जंगी पोत भी भेज दिया है. वहीं अमरीका के विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन ने सीरिया में विद्रोही ठिकानों पर हुए रासायनिक हमले के लिए रूस को ज़िम्मेदार ठहराया है. उन्होंने बताया कि रूस इस बात पर सहमत था कि वह इस बात को आश्वस्त करेगा कि सीरिया से रासायनिक हथियारों का जखीरा ख़त्म हो जाये लेकिन ऐसा हुआ नहीं. अब जब दुनिया की इस वक़्त की ये दो महाशक्तियां आमने-सामने हैं तो बहुत हद तक तीसरा विश्वयुद्ध होना संभव है. ऐसे में एक बड़ा सवाल उठ खड़ा हुआ है कि विश्वयुद्ध की स्थिति में कौन देश किसके साथ होगा? कौन सा देश किसके पाले में जायेगा?

अमेरिका का साथ दे सकते हैं कुछ देश

सीरिया में अब से 6 साल पहले जब अरब स्प्रिंग के प्रभाव में विद्रोह शुरू हुआ था तो अमेरिका बशर-अल-असद के विरोध में खड़ा हो गया था. और चूंकि ये मामला अरब से भी जुड़ा है तो सबसे पहले उसके पक्ष में खड़ा दीखता है इजराइल. इसके अलावा नाटो के सहयोगी देश ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी समेत ऐसे कई देश हैं जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हर मामले में अमेरिका के साथ ही खड़े दिखते हैं. सीरिया का पडोसी तुर्की तो पहले से ही अमेरिका के साथ है. तुर्की पहले से ही रूस के साथ तनातनी के चलते अमेरिका का साथ देता है. अमेरिका के सहयोगी ग्रुप-7 के सदस्य देशों के विदेश मंत्री इटली में मुलाकात कर रहे हैं. इस मीटिंग में इस बात पर चर्चा की जाएगी कि रूसी सरकार पर सीरियाई राष्ट्रपति बशर-अल-असद से दूरी बनाने का दबाव किस तरह बनाया जाए.

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ब्रिटेन
ब्रिटेन की सरकार ने अमेरिका के सीरिया पर हमले का पूरा समर्थन किया है. ब्रिटेन के रक्षा मंत्री माइकल फैलन ने अमेरिका की कारवाई को सही और सीमित बताया.

तुर्की
तुर्की के राष्ट्रपति तैयब उर्दोगन ने इस हमले को सीरिया में हो रहे कथित युद्ध अपराध पर सही जवाब बताया है.

इस्राइल
इस्राइल के प्रधानमंत्री बेन्यामिन नेतन्याहू ने एक बयान जारी कर अमरीकी कार्रवाई का पूरा समर्थन किया.

फ्रांस
फ्रांस वैसे अमेरिका के साथ खड़ा दिखता है लेकिन सीरिया में इसकी स्थिति पशोपेश वाली है. पेरिस में हुए आतंकी हमलों के बाद फ्रांस के युद्धक विमानों ने सीरिया में आईएसआईएस के ठिकानों पर बमबारी की थी लेकिन रूस के साथ तनाव की स्थिति में फ्रांस अमेरिका के साथ ही खड़ा होगा.

सऊदी अरब
अमेरिका की ही तरह सुन्नी बहुल खाड़ी देश सऊदी अरब भी किसी भी कीमत पर असद को हटाने पर अड़ा है. 2013 में जब असद पर रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल का आरोप लगा था तब सऊदी अरब चाहता था कि अमेरिका हस्तक्षेप करे. अमेरिका द्वारा ऐसा न करने पर सऊदी अरब नाराज था, हालांकि अब ये देश अमेरिका के नेतृत्व में आईएसआईएस के खिलाफ अभियान में शामिल है.

रूस के खेमे में शामिल देश

रूस, ईरान और सीरिया की सरकार अगले अमेरिकी हवाई हमले पर जवाब देने का मन बना चुकी है. अमेरिका ने पिछले हफ्ते सीरिया के एयरबेस पर हमला किया था. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प सीरिया के राष्ट्रपति बशर-अल-असद को तानाशाह तक कह चुके हैं. सीरियाई सरकार के मुख्य सैन्य सहयोगी रूस ने इन हमलों को अंतरराष्ट्रीय मानदंडों का उल्लंघन करने वाली और मनगढ़ंत आधार पर की गई आक्रामक कार्रवाई बताया. रूसी सरकार के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोफ़ ने अमरीका और रूस के पहले से खस्ताहाल संबंधों के गंभीर रूप से बिगड़ने की चेतावनी दी.

ईरान
ईरान सीरिया का बड़ा समर्थक है. ईरान ने सीरिया पर अमेरिकी हमले की कड़ी निंदा की है.

वो देश जिनका रुख अभी तक स्पष्ट नहीं

चीन
चीनी सरकार ने सीरिया में बिगड़ते हालात पर चिंता जताई है. चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता ने कहा कि किसी देश, संस्था, व्यक्ति की तरफ़ से किसी भी हालत में रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल का चीन विरोध करता है लेकिन सबसे ज़रूरी है कि सीरिया की हालत को और न बिगड़ने दिया जाए.

भारत
भारत ने सीरिया मामले पर कोई स्पष्ट रुख तो नहीं दिखाया है क्योंकि अमेरिका के साथ भी भारत के अच्छे रिश्ते हैं और रूस सबसे अहम सहयोगी है. वहीं सीरिया के साथ भी भारत के परंपरागत संबंध रहे हैं. हालांकि, भारत ने सीरिया, लीबिया जैसे देशों में अपने नागरिकों के जाने पर ट्रैवल एजवाइजरी जारी की है. भारत अमेरिका और सोवियत संघ के बीच शीत युद्ध के काल में भी तटस्थता की नीति को अपनाता रहा और किसी भी गुट में शामिल नहीं हुआ था.

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