10 04 2018 10hijab

संयुक्त राष्ट्र संघ की मानवाधिकार कमेटी ने फ़्रांस की ओर से हिजाब पर लगाए गए प्रतिबंध को मानवाधिकारों का हनन करार दिया। साथ ही इन कानून पर दोबारा विचार करने को कहा है।

मानवाधिकार कमेटी ने कहा कि फ़्रांस इस क़ानून पर स्पष्टीकरण देने में नाकाम रहा है। पैनल की रिपोर्ट क़ानून नहीं है लेकिन यह फ़्रांस की अदालतों पर प्रभाव डाल सकती है। कमेटी का कहना है कि वह चेहरे के नक़ाब पर प्रतिबंध और सुरक्षा के संबंध में या समाज में एक साथ रहने का उद्देश्य हालिस करने के संबंध में फ़्रांस के दावों से संतुष्ट नहीं है।

विशेषज्ञों पर आधारित इस 18 सदस्यीय पैनल को इंटरनैशनल कोनोवेन्ट आन सिविल पोलिटिकल राइट्स का समर्थन भी हासिल है। पैनल के फ़ैसले बाध्यकारी तो नहीं हैं लेकिन समझौते पर हस्ताक्षर करने के नाते फ़्रांस के लिए इनका पालन करना अंतर्राष्ट्रीय क़ानूनी ज़िम्मेदारी है।

ध्यान रहे जुलाई 2014 में मानवाधिकार की यूरोपीय अदालत ने फ़्रांस में हिजाब पर प्रतिबंध को सही ठहराते हुए पूरे चेहरे के नक़ाब पर प्रतिबंध को धार्मिक आज़ादी का हनन बताने वाले तर्क को ख़ारिज कर दिया था।

संयुक्त राष्ट्र संघ की मानवाधिकार कमेटी ने अपने बयान में यूरोपीय अदालत के इस फ़ैसले से मतभेद करते हुए कहा कि यह प्रतिबंध महिलाओं को अपने धार्मिक कर्तव्यों के निर्वाह के अधिकारों से वंचित कर रहा है और इस तरह यह महिलाएं घर तक सीमित होकर पिछड़ेपन की शिकार हो सकती हैं।

कमेटी की यह रिपोर्ट 2012 में दो साल पहले 2010 के क़ानून के तहत सज़ा पाने वाली दो फ़्रांसीसी महिलाओं की शिकायत के बाद सामने आई जिसमें कहा गया था कि सार्वजनिक स्थानों पर चेहरे को छिपाने की नीयत से कपड़े को प्रयोग नहीं किया जा सकता।

कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि इस प्रतिबंध ने दो महिलाओं के अधिकारों का हनन किया और फ़्रांस को चाहिए कि इन महिलाओं को हर्जाना दे।

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