अमेरिका ने 13 अप्रैल 2017 की शाम अफगानिस्तान के नांगरहार पर एक बम गिराया. कहा गया कि ये बम आइएसआइएस के आतंकवादियों को मारने के लिए गिराया गया. कहा ये भी गया कि इस हमले में 31 आतंकवादी मारे गए. अफगानिस्तान ने इस बात की पुष्टि की कि इस हमले में 94 आतंकवादी मारे गए. अमेरिका ने इस बम के ज़रिये उत्तरी कोरिया को भी चेतावनी देने की कोशिश की. इस एक बम को गिराने में अमेरिका ने 40 करोड़ डॉलर से अधिक का खर्चा किया है.

सवाल ये है कि क्या 50-100 आतंकवादियों को मारने के लिए अमेरिका ने इतना शक्तिशाली बम गिराया? आखिर ये नुकसान किसका है? अमेरिका का कहना है कि उसने आइएसआइएस का बड़ा नुकसान किया है, उनकी सुरंगें तबाह कर दी हैं, बहुत से आतंकवादी मार दिए है. लेकिन क्या कुछ आतंकवादियों को मारने के लिए इतने बड़े स्तर पर हुआ खर्च अमेरिका की समझदारी है? 40 करोड़ डॉलर में अस्थायी तौर पर एक छोटे देश की गरीबी मिटाई जा सकती है. अमेरिका में ऐसी बहुत सी समस्याएं हैं जिनका समाधान होना बाकी है.

ऐसा नहीं है कि अमेरिका के पास आइएस को ख़त्म करने का अन्य कोई उपाय नहीं है लेकिन अफगानिस्तान पर अमेरिका का ये हमला उसकी मूर्खता के साथ-साथ उसके दिखावे को उजागर करता है. इतनी बड़ी धनराशि में अमेरिका की 14.3 प्रतिशत गरीब जनता का भला हो सकता था. यही नहीं, ट्रम्प चाहते तो अमेरिका की 4 प्रतिशत से ऊपर की बेरोजगार आबादी के लिए बहुत कुछ कर सकते थे. ट्रम्प के पास अपने ही देश के लिए करने को बहुत कुछ है लेकिन उनका पूरा ध्यान दुनिया में दिखावा करने पर केन्द्रित है. इस तरह से ‘अमेरिका ग्रेट अगेन’ हो न हो, लेकिन अमेरिका की जनता मूर्ख और बाकी दुनिया परेशान ज़रूर हो रही है.

और इतने पर ही ट्रम्प बस नहीं करते, वे सरलता से कह देते हैं कि ‘गैर-परमाणु बम’ गिराया गया है. बम गैर परमाणु हुआ तो इसका अर्थ ये नहीं कि कोई नुकसान नहीं हुआ. इस बम का असर एक छोटे परमाणु बम जितना ही हुआ है. कौन कह सकता है कि जिस इलाके में ये बम गिराया गया वहां कोई आम जन या गैर-आतंकी शख्स मौजूद नहीं था? लेकिन अमेरिका ने ये बम बहुत सोची-समझी रणनीति के तहत गिराया है. इस बम के गिरने से जितनी तबाही हुई है, उस में कितने लोग मारे गए और मारे जाने वाले कौन थे इसका कोई अंदाज़ा नहीं लग सकता.

इस हमले के शिकार बहुत से ऐसे लोग हुए होंगे जिनका कहीं कोई रिकॉर्ड नहीं रहेगा. आखिर मृतकों का रिकॉर्ड रखने के लिए शव भी तो मिलने चाहियें. जो भाप ही हो गए उनकी मरने के बाद पहचान और गिनती भी कैसे संभव है? अमेरिका ने चाहे जो भी सोच कर ये हमला किया हो, पर वास्तव में ये सरासर उसकी मूर्खता ही है. और बहुत हद तक ये भी संभव है कि इस हमले के ज़रिये अमेरिका ने कुछ ऐसा ख़त्म किया है जिसे वो दुनिया के सामने आने ही नहीं देना चाहता हो.

अफगानिस्तान पर गिराया गया ये बम अमेरिका के गैर परमाणु बमों में सबसे अधिक बड़ा और शक्तिशाली था. अमेरिकी सेना के लिए अल्बर्ट वीमोट ने ये बम बनाया था. तकरीबन 10 क्विंटल यानि 21,000 पौंड (9797 किलो) वजनी इस बम का नाम जीबीयू-43 है. इसे मदर ऑफ़ आल बम के नाम से जाना गया. इतने वजन के कारण इस घातक बम को एमसी-130 मालवाहक विमान से गिराया गया. ये बम ज़मीन से 6 फुट ऊपर ही हवा में फट गया. इसका धमाका इतना तीव्र था कि जहाँ ये बम गिरा वहां ज़मीन में 300 मीटर गहरा गड्ढा हो गया है.

धमाका होने के कुछ ही सेकंडों में सुरंगों और सैकड़ों फीट के दायरे में ऑक्सीजन ख़त्म हो गयी. जिससे वहां एक घुटन पैदा हो गयी और उस इलाके में मौजूद सभी के फेफड़े फट गए होंगे. धमाके की आवाज़ 32 किलोमीटर दूर तक सुनी गयी. इससे उठने वाली तेज़ लहर अपने रास्ते में आने वाली हर एक चीज को ख़त्म करती चली गयी. धमाके की आवाज़ से लोगों के कान पूरी तरह ख़राब हो जाते हैं और धमाके के ज़बरदस्त दबाव से अंदरूनी अंग बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाते हैं. कहा जा रहा है कि इस बम की जद में आने वाला हर जीवधारी भाप बनकर उड़ गया होगा.

अब सोचने वाली बात ये है कि क्या इस बम के गिरने से अफगानिस्तान के नांगरहर में कोई जिंदा बचा होगा. इस बम का असर डेढ़ किलोमीटर के दायरे तक हुआ. आने वाले वक़्त में अफगानिस्तान में आइएसआइएस रहे या ख़त्म हो, क्या नांगरहार की ज़मीन बरसों तक सामान्य हो पायेगी. शायद ऐसा संभव भी हो, लेकिन अमेरिका के पहले सीरिया और अब अफगानिस्तान पर सीधे हमले को दुनिया में अमेरिका की तानाशाही और दादागिरी से जोड़ कर देखा जा रहा है जो किसी भी वजह से कहीं भी हमला कर देता है. और कुल जमा बात ये ही है इस तरह के हमले अमेरिका की आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई से ज्यादा उसकी शोबाज़ी और उससे भी बढ़कर उसकी मूर्खता को साबित कर रहे हैं.

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