म्यांमार में सुरक्षा बलों और बौद्ध आतंकियों के हाथों सुनियोजित तरीकें से हो रहे रोहिंग्या मुस्लिमों के जनसंहार पर 57 इस्लामिक देशों के संगठन इस्लामी सहयोग संगठन (OIC) ने कड़ा रुख इख्तियार करते हुए कहा कि म्यांमार के रोहिंग्या मुसलमानों की समस्या एक आंतरिक समस्या नहीं है बल्कि एक अंतरराष्ट्रीय समस्या है. संगठन की और से कहा गया कि ऐसे में अब म्यांमार के मुसलमानों की समस्या का समाधान विश्व समुदाय के सामूहिक प्रयास में नीहित है.

हाल ही में सयुंक्त राष्ट्र संघ की और से जांच के लिए भेजी गई प्रतिनिधि यांग ली ने अपनी जांच के बाद इस बात की पुष्टि की हैं कि वहां पर मुसलमानों के विरुद्ध हिंसक कार्यवाहियां की गई हैं. ली पहले ही राखिने में सैन्य कार्रवाई को “अस्वीकार्य” करार दे चुकी हैं. सयुंक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार अक्तूबर वर्ष 2016 से अब तक 87 हज़ार मुसलमान अपना घर बार, कार्य स्थल और खेत छोड़कर चले गये.

इस सबंध में  कुछ दिनों पहले मलेशिया की राजधानी कुआलालम्पुर में ओआईसी की आपात बैठक में चेतावनी देते हुए कहा गया था कि म्यांमार सरकार रोहिंग्या संकट से निपटने के लिए तत्काल निर्णायक कदम” उठाए. म्यांमार सरकार से अपील की गई थी कि यह सुनिश्चित करे  कि सुरक्षा बलों को कानून के अनुसार हिंसा रोकने के लिए जवाबदेह ठहराया जा सके.

बैठक में कहा गया था कि “म्यांमार में कंबोडिया और रवांडा की तरह हम एक और नरसंहार नहीं चाहते हैं, जो वहां हुआ उसे रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय पर्याप्त रूप में नाकाम रहा. लेकिन म्यांमार इस बैठक को राजनितिक रूप देते हुए इसका दोष मलेशिया पर डालते हुए कहा था कि ‘म्यांमार एक बौद्ध देश हैं. ऐसे में अफ़सोस हैं कि मलेशिया ने ”अपने एक निश्चित राजनीतिक एजेंडे को बढ़ावा देने के लिए” ये बैठक बुलाई.

म्यांमार में मुसलमानों के विरुद्ध होने वाली हिंसा से संयुक्त राष्ट्रसंघ, इस्लामी सहयोग संगठन, जनसंगठन और इस्लामी जगत चिंतित है और इस्लामी सहयोग संगठन ओआईसी ने मुसलमानों के विरुद्ध होने वाली हिंसा को नस्ली सफाये का नाम दिया है.

म्यांमार की यात्रा पर जाने वाले ओआईसी के विशेष दूत हामिद अलबार ने स्पष्ट किया है कि म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों की समस्या के समाधान के लिए प्रयास किया जाना चाहिये क्योंकि अब यह केवल आंतरिक समस्या नहीं है.


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