केंद्र में प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी द्वारा सत्ता सँभालने के साथ ही अल्पसंख्यकों और दलितों को भेदभाव और उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा हैं. इसी के साथ इनके खिलाफ देश में घृणा अपराधों, सामाजिक बहिष्कार और जबरन धर्मांतरण भी बढ़ गए हैं.

अंतरराष्ट्रीय धर्मिक स्वतंत्रता के लिए अमेरिकी आयोग की और से जारी रिपोर्ट में कहा गया कि ‘कांग्रेस पार्टी और भाजपा के नेतृत्व वाली सरकारों में अपरिभाषित कानूनी, अप्रभावी आपराधिक न्याय तंत्र और विधिशास्त्र में संगति के अभाव के कारण धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों और दलितों ने भेदभाव और उत्पीड़न का सामना किया. साथ ही अमेरिकी सरकार से कहा गया कि वह भारत के साथ व्यापार और कूटनीतिक बातचीत के समय मानवाधिकारों को प्रमुखता दें.

आयोग के अध्यक्ष थॉमस जे रीज ने कहा, ‘भारत एक ऐसे संविधान के साथ धार्मिक आधार पर विविध और लोकतांत्रिक समाज है जो उसके नागरिकों को उनके धर्म के आधार पर कानूनी समानता देता है और धर्म के आधार पर भेदभाव पर रोक लगाता है। हालांकि हकीकत इसे उलट है. भारत की बहुलवादी परंपरा कई राज्यों में गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही हैं.’

मुस्लिम परिवार में शादीे करने के इच्छुक है तो अभी फोटो देखकर अपना जीवन साथी चुने (फ्री)- क्लिक करें 

मई 2014 के चुनावों में भाजपा की जीत के बाद भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों का भविष्य खतरे में पड़ गया हैं. रिपोर्ट में भारत से आग्रह किया गया है कि वह धर्मांतरण रोधी कानूनों में सुधार करें और यह माने कि बल प्रयोग, धोखे या लालच से कराया गया धर्मांतरण और फिर से धर्म परिवर्तन समान रूप से बुरा है. साथ ही धार्मिक और भाषायी अल्पसंख्यकों (2007) के लिए आयोग की सिफारिशों को लागू करने का अनुरोध किया गया है.

हालाँकि भारत ने इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया हैं. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने कहा, हमें उनकी विश्वसनीयता पर गंभीर संदेह है. सरकार का मानना है कि संवैधानिक रूप से सुरक्षित भारतीय नागरिकों के अधिकारों की स्थिति पर यूएससीआईआरएफ जैसी किसी विदेशी इकाई को कुछ कहने का हक नहीं है. हम उनकी रिपोर्ट का संग्यान नहीं लेते.

Loading...