Saturday, September 18, 2021

 

 

 

हिंदूवादी संगठनो को सरकार का पूरा समर्थन हासिल

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बीबीसी हिंदी में छपी रिपोर्ट के अनुसार अंतरराष्ट्रीय धार्मिक आज़ादी पर नज़र रखने वाले अमरीकी आयोग यूएससीआईआरएफ़ (यूएस कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलिजियस फ़्रीडम) की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक़ साल 2015 में भारत में असहिष्णुता बढ़ी है और धार्मिक आज़ादी के अधिकारों के उल्लंघन के मामलों में भी इज़ाफ़ा हुआ है.

रिपोर्ट की मुख्य बातें.

  1. अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यक हिंदूवादी गुटों के हाथों धमकी, उत्पीड़न और हिंसा की बढ़ती घटनाओं का सामना करना पड़ा है.
  2. सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी के नेता इन गुटों का ख़ामोशी से समर्थन करते हैं और माहौल को ज़्यादा ख़राब करने के लिए धार्मिक भावना को भड़काने वाली भाषा का इस्तेमाल करते हैं.
  3. पुलिस के पक्षपातपूर्ण रवैए और अदालत से भी जल्द इंसाफ़ नहीं मिलने के कारण अल्पसंख्यक समुदाय के लोग ख़ुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं.
  4. पिछले साल में मुसलमानों को बढ़ते उत्पीड़न, हिंसा और भड़काऊ भाषण का शिकार होना पड़ा है. योगी आदित्यनाथ और साक्षी महाराज जैसे बीजेपी के सांसदों ने मुसलमानों की जनसंख्या को रोकने के लिए क़ानून बनाने की मांग की है.
  5. फ़रवरी 2015 में संघ की एक बैठक के वीडियो में बीजेपी के कई राष्ट्रीय नेता मंच पर बैठे देखे जा सकते हैं. इस बैठक में कई नेता मुसलमानों को ‘शैतान’ कहते हुए और उन्हें बर्बाद करने की धमकी देते हुए देखे जा सकते हैं.
  6. मुसलमानों का कहना है कि वो सामाजिक दबाव और पुलिस के रवैए के कारण इस तरह की घटनाओं की शायद ही आधिकारिक शिकायत करते हैं.
  7. उनके अनुसार चरमपंथी होने के आरोप में मुसलमान लड़कों को पुलिस गिरफ़्तार करती है और बिना मुक़दमे के सालों तक उन्हें जेल में रखती है.
  8. गोहत्या पर पाबंदी के कारण मुसलमानों और दलितों का आर्थिक नुक़सान तो हो ही रहा है, इसके अलावा इस क़ानून के कथित उल्लंघन का मामला बनाकर मुसलमानों को परेशान किया जा रहा है और हिंदुओं को हिंसा के लिए उकसाया जा रहा है.
  9. साल 2015 में ईसाइयों पर हिंसा के 365 मामले सामने आए जबकि साल 2014 में ये संख्या 120 थी. ईसाई समुदाय इसके लिए हिंदूवादी गुटों को ज़िम्मेदार मानती हैं जिन्हें भाजपा सरकार और पार्टी का समर्थन हासिल है.
  10. धर्म परिवर्तन क़ानून के कारण मुसलमानों और ईसाइयों को प्रताड़ित किया जाता है. दिसंबर 2014 में हिंदूवादी गुटों ने घर वापसी कार्यक्रम की घोषणा की थी जिसके तहत हज़ारों मुसलमानों और ईसाइयों को दोबारा हिंदू बनाने की योजना थी. लेकिन इस मुद्दे पर देश-विदेश में बवाल मचने के बाद आरएसएस ने इसे स्थगित कर दिया. 2015 में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने धर्म परिवर्तन पर पाबंदी लगाने के लिए राष्ट्रव्यापी क़ानून बनाने की मांग की थी.
  11. अप्रैल 2015 में भारत के गृह मंत्रालय ने लगभग 9000 ग़ैर-सरकारी संस्थाओं का लाइसेंस रद्द कर दिया. सरकार का कहना है कि इन संस्थाओं ने फ़ेरा क़ानून का उल्लंघन किया था जिसके कारण उनपर कार्रवाई की गई थी लेकिन इन संस्थाओं का कहना है कि सरकार की नीतियों का विरोध करने के कारण उन्हें निशाना बनाया जा रहा है.
  12. गृह मंत्रालय के अनुसार साल 2015 में पिछले साल (2014) की तुलना में सांप्रदायिक हिंसा के मामले में 17 फ़ीसदी का इज़ाफ़ा हुआ है. मुसलमानों का आरोप है कि धर्म के आधार पर उन्हेंं हिंसा का शिकार बनाया जाता है लेकिन सरकार इसे दो गुटों के बीच हिंसा की वारदात बताती है.
  13. मार्च 2016 में भारत सरकार ने यूएसीआईआरएफ़ की टीम को वीज़ा देने से इनकार कर दिया था.

यूएससीआईआरएफ़ ने अपनी रिपोर्ट में अमरीकी सरकार को कुछ सुझाव भी दिए हैं.

  1. भारत के साथ द्विपक्षीय वार्ता में धार्मिक आज़ादी का मुद्दा भी उठाया जाए.
  2. भारत स्थित अमरीकी दूतावास का ध्यान इन मामलों में केंद्रित किया जाए. दूतावास के अधिकारियों को इस तरह की घटनाओं का जायज़ा लेने के लिए घटना-स्थल का दौरा करना चाहिए और धार्मिक नेताओं, स्थानीय अधिकारियों से मुलाक़ात करनी चाहिए.
  3. भारत सरकार पर दबाव बनाना चाहिए कि वो यूएससीआईआरएफ़ की टीम को भारत का दौरा करने की इजाज़त दे.
  4. भारत सरकार से कहना चाहिए कि वो अपनी पुलिस और न्यायिक अधिकारियों को मानवाधिकार मामले की और ट्रेनिंग दे, धर्म परिवर्तन क़ानून में संशोधन किया जाए और भारत सरकार उन अधिकारियों और नेताओं पर लगाम लगाए जो भड़काऊ भाषण देते हैं.

यूएसीआईआरएफ़ अमरीका का एक स्वतंत्र आयोग है जिसका काम दुनिया भर में धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकारों पर नज़र रखना है. इसके सुझाव अमरीकी विदेश मंत्रालय पर बाध्य नहीं हैं.

भारत में धार्मिक आज़ादी के आधार पर आयोग ने इस साल भी भारत को टियर-2 में रखा है. इस श्रेणी में भारत के साथ अफ़ग़ानिस्तान, क्यूबा, इंडोनेशिया, अज़रबैजान, कज़ाकस्तान, लाओस, मलेशिया, रूस और तुर्की शामिल हैं.

लेकिन आयोग का कहना है कि वो इस साल भी भारत पर कड़ी नज़र रखेगा ताकि वो फ़ैसला कर सके कि वो भारत को सीपीए (कंट्री ऑफ़ पर्टिकुलर कंसर्न) की श्रेणी में रखने के लिए अमरीकी विदेश मंत्रालय को सिफ़ारिश करे या नहीं.

आयोग ने पाकिस्तान समेत आठ देशों को इस कैटेगरी में रखने की सिफ़ारिश की है.

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